Dr. Surendra Kumar
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Dr. Surendra Kumar

हरियाणा प्रान्त के गांव-मकड़ौली, जिला रोहतक में, श्री गहरसिंह जी एवं माता श्रीमती शान्तिदेवी के यहा जन्मप्राप्त डॉ० सुरेन्द्रकुमार संस्कृत तथा हिन्दी-साहित्य के चिन्तक हैं। आपने प्रक्षिप्त विषयों के शोध को एक नयी दिशा दी है। आपने विभिन्न संस्थाओं में रहकर संस्कृत तथा हिन्दी का गम्भीर एवं व्यापक अध्ययन किया है। सभी परीक्षाओं में आपका शैक्षिक स्तर अतिउत्तम रहा है। महाविद्यालय गुरुकुल झज्जर (हरियाणा) से व्याकरण, दर्शन, निरुक्त में 'आचार्य' तथा 'वेदवाचस्पति' परीक्षाएं उत्तीर्ण की। गुरुकुल महाविद्यालय ज्वालापुर (हरिद्वार) से विद्याभास्कर और गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार से एम.ए. हिन्दी उपाधि विश्वविद्यालय में सर्वप्रथम स्थान पर रहकर प्राप्त की। पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़ से एम.ए. संस्कृत तथा पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त की। आप पैंतीस वर्षों से महाविद्यालयों में प्राध्यापक के रूप में अध्यापनरत हैं। आपकी दस पुस्तकें तथा एक सौ से अधिक लेख प्रकाशित हो चुके हैं। सम्पादित ग्रन्थ इनके अतिरिक्त हैं। आकाशवाणी पर आधा दर्जन के लगभग वार्ताएं प्रसारित हो चुकी हैं। 'मनु का विरोध क्यों' पुस्तक हिन्दी, अंग्रेजी, मराठी, गुजराती आदि कई भाषाओं में प्रकाशित हो चुकी है। 'विशुद्ध मनुस्मृति' मराठी तथा गुजराती में अनूदित होकर प्रकाशित हो चुकी है। आप द्वारा मनुस्मृति में प्रक्षेपों पर किया गया अनुसन्धान कार्य साहित्यिक मानदण्डों पर आधारित नया शोध है। वह इतना प्रशंसनीय, उल्लेखनीय एवं प्रामाणिक है कि उसने आपको देश-विदेश में ख्याति दिलाई है। आज आपके भाष्ययुक्त मनुस्मृति सर्वाधिक पढ़ी जाती है। उसके अनेक संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। लेखन कार्य पर अब तक आपको राष्ट्रीय और प्रान्तीय स्तर के नौ पुरस्कार/सम्मान प्राप्त हो चुके हैं, जिनमें आर्यसमाज सांताक्रुज, मुम्बई में प्रदत 'मेघजी भाई आर्य साहित्य लेखक पुरस्कार' तथा श्री विक्रम प्रतिष्ठान (अमेरिका) द्वारा प्रदत्त 'वेदवागीश पुरस्कार' विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

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क्या मनुस्मृति में प्रक्षेप हैं? (भाग 3)

डॉ० अम्बेडकर ने अपने ग्रन्थों में मनुस्मृति के लोकार्थ प्रमाण रूप में उद्धृत किये हैं उनमें बहुत सारे परस्परविरोधी विधान वाले हैं (द्रष्टव्य 'डॉ० अम्बेडकर के लेखन में परस्परविरोध' शीर्षक अध्याय ९)।

क्या मनुस्मृति में प्रक्षेप हैं? (भाग 2)

इसी प्रकार मनुस्मृति में भी समय-समय पर प्रक्षेप हुए हैं। अपितु, मनुस्मृति में अधिक प्रक्षेप हुए हैं क्योंकि उसका सम्बन्ध हमारी दैनंदिन जीवनचर्या से था

क्या मनुस्मृति में प्रक्षेप हैं? (भाग 1)

मनुस्मृति के प्रक्षेपों पर विचार करने से पूर्व अन्य संस्कृत साहित्य के प्रक्षेप-विषयक इतिहास पर एक दृष्टिपात किया जाता है जिससे पाठकों को प्रक्षिप्तता की अनवरत प्रवृत्ति का ज्ञान हो सके।