ज्ञान का आदिमूल

वनस्पति शास्त्र (Botany) के अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त डॉक्टर बीरबल साहनी का कहना था कि सृष्टि के आरम्भ में बहुत थोड़ा ज्ञान था धीरे-धीरे उन्नति करते हुए वह उस अवस्था को प्राप्त हो गया जहाँ आज विज्ञान पहुँचा हुआ है

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ज्ञान का आदिमूल
Swami Vidyanand Sarswati

He was the Principal of postgraduate colleges in Hoshiarpur and Panipat and president, minister and member of many institutions during his 50 years of teaching. Actively participated in all the important satyagrahas in the history of Aryasamaj including Hyderabad Satyagraha 1939, Satyagraha 1919 against the ban on Satyarth Prakash, Hindi Rakshartha Satyagraha 1956, movement against partition of Punjab, 1975. Swami ji has composed more than thirty important compositions in Hindi, Sanskrit and English. ... Know More


  • Apr 22 2022

वनस्पति शास्त्र (Botany) के अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त डॉक्टर बीरबल साहनी का कहना था कि सृष्टि के आरम्भ में बहुत थोड़ा ज्ञान था धीरे-धीरे उन्नति करते हुए वह उस अवस्था को प्राप्त हो गया जहाँ आज विज्ञान पहुँचा हुआ है (There was some knowledge in the very beginning of the world, it evolved and reached the stage where we find it today) जब उनसे पूछा गया कि आरम्भ में ज्ञान कहाँ से आया, क्योंकि शून्य से तो कुछ उत्पन्न नहीं हो सकता? (Wherefrom did knowledge came in the beginning, because nothing could come out of nothing) तो डाक्टर बीरबल ने कहा- (With this we are not concerned. We take it for granted that there was some knowledge in the beginning of the world).

सृष्टि में ज्ञान की सत्ता का निषेध नहीं किया जा सकता। ज्ञान न होता तो कहाँ से आ जाता, क्योंकि अभाव से भाव की उत्पत्ति नहीं होती। ज्ञान गुण है, द्रव्य के आश्रित रहने से ज्ञान गुण का आश्रयभूत कोई द्रव्य अवश्य होना चाहिए। जिस प्रकार जड़ प्रकृति स्वतः कार्य में प्रवृत्त नहीं हो सकती, उसी प्रकार मानव बुद्धि भी जड़ होने से किसी चेतन की प्रेरणा की अपेक्षा रखती है। बुद्धि एक जन्मजात शक्ति है, किन्तु ज्ञान अर्जित शक्ति है। पशुओं की भांति मनुष्य केवल स्वाभाविक ज्ञान के आश्रित नहीं रह सकता। उसे आरम्भ में गुरुज्ञान मिल जाए तो वह अनुभव, मनन, चिन्तन व संवेदन के सहयोग से बुद्धि के द्वारा अर्थात् नैमित्तिक ज्ञान के सहारे ज्ञान की सीढ़ी पर चढ़ते चले जाने में समर्थ हो जाता है। इसी व्यवस्था में मनुष्य-योनि की सार्थकता है। यही ऐसी योनि है जिसमें जीव को विकास का अवसर मिलता है, परन्तु यह विकास स्वतः नहीं होता। समुचित साधनों के रूप में नैमित्तिक ज्ञान के द्वारा ही यह सम्भव होता है, परन्तु स्वयं वही विकसित होकर मनुष्य के व्यवहार आदि के लिए पर्याप्त नही होता। यदि स्वाभाविक ज्ञान के सहारे अपने अनुभव-मात्र से मनुष्य ज्ञान प्राप्त कर सकता तो जंगलों में रहनेवाला प्रत्येक व्यक्ति गणित या व्याकरण का आचार्य, डॉक्टर, इंजीनियर और विज्ञानवेत्ता बन गया होता। याद जीवात्मा स्वत: ज्ञान प्राप्त कर सकता तो मनष्योत्पत्ति के करोड़ों वर्ष बात पर अब तक ज्ञान की पराकाष्ठा हो गई होती। बहुत-से सर्वज्ञ हो गये होते। स्कूल कालिज सभी समाप्त हो गये होते, किन्तु आज भी बड़े से बड़े विद्वान का बालक भी बिना पढ़े-पढ़ाये विद्वान् नहीं बनता देखा जाता।
यदि विकासवाद की मान्यता के अनुसार ज्ञान के उत्तरोत्तर विकास का सिद्धान्त सत्य होता तो निश्चय ही प्रत्येक जाति का वर्तमान काल उसके अतीत से उत्कृष्ट होता और भविष्य के वर्तमान से अधिक उज्ज्वल होने की गारण्टी होती। इस विषय में सभी व्यक्ति, समाज व देश आश्वस्त होते. परन्तु कहीं भी ऐसा देखने में नहीं आता। भारत, चीन, मिस्र, यूनान आदि देशों के बारे में प्रायः सुनने में आता है कि साहित्य, कला-कौशल, दर्शन और विज्ञान आदि की दृष्टि से उनका अतीत आज की अपेक्षा कहीं अधिक गौरवपूर्ण था।
पशु-पक्षी हों या मनुष्य- जीवमात्र स्वाभाविक ज्ञान से युक्त है। स्वाभाविक ज्ञान की दृष्टि से मनुष्य पशु-पक्षियों से पीछे है। पशु पैदा होते ही तैरने लगता है। राजस्थान की (मरुस्थल में रहने के कारण) भैंस ने जीवन में तैरने योग्य पानी देखा भी नहीं होगा । ऐसी अवस्था में उसके तैरने का अभ्यास करने का प्रश्न ही नहीं उठता, फिर भी उसका सद्योजात बच्चा पानी में घुसते ही तैरने लगेगा। इसके विपरीत नदी के किनारे रहनेवाला या जीवनभर मल्लाह का काम करनेवाले का बालक भी बिना सीखे नहीं तैर सकता। तैरने की कौन कहे मानव शिशु को तो जब तक उसे अंगुली पकड़कर सिखाया न जाए, चलना भी नहीं आता। स्वाभाविक ज्ञान से युक्त होने और उच्च कोटि के विद्वान् माता-पिता की सन्तान होने पर भी बालक को पढ़ने के लिए विद्यालय में जाना पड़ता है। वर्तमान समाजशास्त्री भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि मनुष्य जैसे भी हो, समाज से ही ज्ञान ग्रहण करता है। इसलिए आज भी यदि किसी बालक को मानव समाज से पृथक कर दिया जाए तो वह, पशुवत् ही व्यवहार करेगा। समय-समय पर हुए परीक्षणों से अनेक बार यह सिद्ध हो चुका है। यही कारण है कि सामान्यतः मनुष्य जिस समाज में जन्म लेता है, उसी की भाषा में व्यवहार करता है। सिखाने से तो सर्कस में बन्दर, हाथी और घोड़े आदि पशु कई प्रकार के करतब दिखा सकते हैं, परन्तु स्वतन्त्र रूप में उनका आचरण आज भी वैसा ही है जैसा आज से लाखों, करोड़ों वर्ष पूर्व था। मनुष्योचित व्यवहार का प्रदर्शन करने में दक्ष चिम्पाजी भी चिड़ियाघर में आकर ही कुछ सीख पाता है और वह भी कुशल प्रशिक्षक के द्वारा ही।
पशु-जगत् में ही नहीं मानव जगत् में भी यही नियम कार्य करता है। कोई कुल कितना ही ज्ञानवान् क्यों न हो और कितनी ही पीढ़ियों से उसमें शास्त्रों का ज्ञान परम्परा से क्यों न चला आता हो, तब भी ज्ञानोत्पत्ति क्रमशः सम्भव न होने से उस कुल की सन्तति भी बिना स्वयं पर विद्वान् बन जाए यह कदापि सम्भव नहीं। ज्ञान का यदि क्रमिक विकास होता तो भावी सन्तति में वह स्वतः संक्रमण करता रहता। यदि दो सगे भाइयों में से एक की शिक्षा की समुचित व्यवस्था कर दी जाए और और को उस व्यवस्था से दूर रक्खा जाए तो दूसरा एक ही वंश-परम्परा में सगा भाई होने पर भी मूर्ख रह जाएगा। ज्ञान-प्राप्ति का नैमित्तिक साधनों पर अवलम्बित होना ही इसमें कारण है।
कुछ लोगों को मान्यता है कि मनुष्य प्रकृति से ज्ञान प्राप्त कर लेता है। यह बात सुनने में तो अच्छी लगती है, किन्तु यथार्थ में इसमें कुछ तथ्य नहीं है। प्रकृति स्वयं जड़ है। जब उसी के पास ज्ञान नहीं है तो वह दूसरों को ज्ञान कैसे देगी? यदि प्रकृति ज्ञान दे सकती तो अनादि काल से प्रकृति की पुस्तक सामने खुली रहने पर भी भील, सन्थाल, नागा आदि असभ्य, अशिक्षित क्यों बने रहते? और यदि मनुष्य सचमुच प्रकृति की शिक्षा पर चलने लगेगा तो प्रकृति के अनुगामी पशुओं की स्वाभाविक प्रवृत्तियों का अनुगमन करने लगेगा। परिणामत: पशु-जगत् की भाँति मनुष्य समाज भी सर्वत्र मात्स्यन्याय तथा मातृगमन व स्वसृगमन आदि में प्रवृत्त होगा। तब उसमें मानवता कहा रह जाएगी?
वस्तुतः प्रकति भी नैमित्तिक साधनों से शिक्षित(वर्तमान जन्म में अथवा पूर्वजन्मों में) व्यक्ति के सामने ही अपना रहस्य खोलती है। सेब को गिरता देखकर पृथिवी में गुरुत्वाकर्षण शक्ति का ज्ञान न्यूटन-जैसे वैज्ञानिक को ही हुआ, हर किसी को नहीं। प्रकृति का सहयोग भी सामर्थ्यवान को ही मिलता है। संसार में होती रहनेवाली घटनाओं से भी सामर्थ्यवान् ही शिक्षा ग्रहण कर पाते हैं। आदमी को मरता देखकर अथवा अर्थी जाती देखकर बुद्ध और दयानन्द की तरह हर कोई घर से नहीं निकल जाता।
प्रत्येक ज्ञानेन्द्रिय को अपना कार्य करने के लिए बाह्य सहायता की अपेक्षा है। देखने में समर्थ होते हुए भी आँख को सूर्य अथवा उसके स्थानापन्न दीपक की आवश्यकता होती है। उसके बिना आँख देख नहीं सकती। आकाश के बिना कान, वायु के बिना त्वचा, जल के बिना जिह्वा और पृथिवी के बिना घ्राण अपना-अपना कार्य सम्पन्न नहीं कर सकतीं। जिस प्रकार बाह्येन्द्रियाँ बाह्य सहायता के बिना कार्य नहीं कर सकतीं, उसी प्रकार आन्तरेन्द्रिय बुद्धि भी बाह्य सहायता के बिना कार्य नहीं कर सकती, अतः जैसे ईश्वर की व्यवस्थानुसार प्राकृतिक नियम ने प्रत्येक ज्ञानेन्द्रिय से पूर्व उसका सहायक देवता उत्पन्न किया, उसी प्रकार सर्वोत्तम एवं सूक्ष्म पदार्थों को जानने-परखने के साधन बुद्धि की सहायता के लिए भी कोई सहायक प्रदान न कर्ता, यह कैसे सम्भव था, अत: सृष्टि के आदि में स्वाभाविक ज्ञान के साधन बुद्धि की सहायता के लिए भी परमेश्वर द्वारा ज्ञान का दिया जाना अनिवार्य एवं बुद्धिसंगत है।
जब यह निश्चय हो गया कि मनुष्य किसी के सिखाये बिना कुछ नहीं सीख सकता तो यह देखना चाहिए कि पहली पीढ़ी के मानवों ने अपने व्यवहार को किससे सीखा होगा? जिस प्रकार वर्तमान में हमने अपने माता-पिता आदि से और उन्होंने अपने माता-पिता आदि से और उन्होंने अपने माता-पिता आदि से ज्ञान प्राप्त किया होगा। यह क्रम चलते-चलते जब सृष्टि के आदिकाल में अमैथुनी सृष्टि में पहुँचेगा जहाँ मानव की सर्वप्रथम प्रादुर्भूत पीढ़ी मिलेगी, तब निश्चय ही परमेश्वर के अतिरिक्त अन्य कोई शिक्षक नहीं मिलेगा, अत: मनुष्यमात्र के कल्याणार्थ आदिगुरु परमेश्वर द्वारा अमैथुनी सृष्टि में उत्पन्न मनुष्यों को वेद के रूप में नैमित्तिक ज्ञान का मिलना सर्वथा युक्तियुक्त ठहरता है। उन मनुष्यों द्वारा अपनी सन्तति-अनुसन्तति एवं शिष्यों-प्रशिष्यों में ज्ञान का संक्रमण हुआ। वही क्रम अब तक चला आ रहा है, अतएव संसार में जितना भी ज्ञान है उसका आदिमूल या स्रोत परमेश्वर ही ठहरता है, इसीलिए महर्षि पतञ्जलि ने अपने योगदर्शन में ‘स एष पूर्वेषामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात्’ (योगसूत्र-१/२६) कहकर परमेश्वर को गुरुओं का गुरु बताया है। कपिल, कणाद आदि गुरु देहधारी होने से काल से सीमित थे। ईश्वर देहधारी न होने से काल से सीमित नहीं है, अतः वह सदा बना रहता है- उसपर काल की सीमा कोई प्रभाव नहीं रखती। इसलिए अन्तर्यामी प्रभु अशरीर रहता हुआ अपनी सर्वशक्तिमत्ता से आदि ऋषियों के आत्मा में ज्ञान को संक्रमित कर देता है । इसी ज्ञानराशि को ‘वेद’ नाम से अभिहित किया जाता है। इस प्रकार वह पूर्ववर्ती गुरुओं का भी गुरु कहाता है। इस तथ्य को ऋषि दयानन्द ने आर्यसमाज के दो नियमों में इस प्रकार कहा है –
सब सत्य विद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं उन सबका आदि मूल परमेश्वर है और संहितारूप में परम्परा से उपलब्ध वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है।

[ स्वामी विद्यानन्द सरस्वती – पुस्तक – ‘आर्ष दृष्टि’, पृष्ठ संख्या 44-47 ]

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