जन्नत का बाग और जहन्नुम की आग

तो झूठ को ईश्वर की प्रसन्नता का बाधक मानना पड़ेगा कल्पित भय और झूठा लालच दिलाने वाले लोग स्वयं भी झूठ बोलते हैं। और दूसरों को झूठ बोलने की प्रेरणा करते हैं। कुरान शरीफ भी तो कहती है कि 'मिथ्या कल्पना सच्चाई के सामने काम नहीं आती।।

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जन्नत का बाग और जहन्नुम की आग
Pt. Ganga Prasad Upadhyay

पंडित गंगाप्रसाद (६ सितम्बर १८८१ - २९ अगस्त १९६८) एक आर्य समाजी लेखक और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य थे। वे हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, फारसी और संस्कृत भाषाओं के प्रकांड पंडित थे। ... Know More


  • Apr 23 2022

कुरान शरीफ़ के अनुसार मुहम्मद साहेब के दो कर्त्तव्य हैं। एक शुभ आचरणों के लिए स्वर्ग (जन्नत) का सन्देश और दूसरे दुराचरणों के लिए नरक (जहन्नुम) की भर्त्सना। मुहम्मद साहेब बशीर (शुभफल का सन्देश देने वाले) भी हैं और नज़ीर (अशुभ फलों का भय दिलाने वाले भी। हम ने तुझ को बशीर और नज़ीर बनाकर भेजा।’ (बकर 119)। अल्लाह ने नबियों को बशारत और डराने के लिए भेजा।’ (बकर 213)

स्वर्ग के मोद और नरक की यातनाओं के चित्र सूरत ‘तूर’ से उद्धृत किये जाते हैं ‘उस दिन (अर्थात् कयामत के दिन) झुठलाने वालों (उन लोगों के लिए जिन्होंने पैग़म्बर की बात को न मानकर झूठा बताया) के लिए ख़राबी है। जो असमंजस में पड़े खेल रहे हैं जिस दिन उनको नरक की आग की ओर ढकेल-ढकेल कर ले जायेंगे। यह वही आग है जिसको तुम झूठा समझते थे तो क्या यह जादू है?  या तुम को दिखाई ही नहीं देता?  इसमें प्रवेश कर जाओ। धैर्य करो या धैर्य न करो। तुम्हारे लिए एक सा है जो कर्म तुम किया करते थे उन्हीं का तुम को बदला मिल रहा है। (सूरत तूर ११-१६)

‘जो दोष-रहित हैं वे बागों और आनन्दों में होंगे। जो कुछ उनके स्वामी ने उनको प्रदान किया उसके कारण प्रसन्न और उनके स्वामी ने उनको नरक की यातना से बचा लिया। अपने शुभ कर्मों के पारितोषिक के रूप में मौज से खाओ और पियो। पीठों पर। जो बाराबर बिछे हुए हैं। तकिय लगे हुए। और बड़ी-बड़ी हूरों (अप्सराओं) को हम उनका साथी बनायेंगे। और जिस प्रकार के गोश्त फलों का उनका जी चाहेगा उनको प्रदान करेंगे। वहां एक दूसरे से शराब के प्याले झपट लिया करेंगे। जिसके पीने से सिर नहीं फिरेगा। न कोई पाप की बात। और युवा सेवक जो ऐसे होंगे जैसे छिपाये हुए मोती उनके आस पास फिरेंगे।” (सूरत तूर आयत १७-२०, २२-२४) यह नमूना है नरक की आग का और स्वर्ग के बाग का। इसी प्रकार का चित्र और दूसरी जगहों पर खींचा गया है। जहां कहीं-कहीं आंशिक भेद है। बात वही है सत्याचरण के लिए स्वर्ग के मोद-प्रमोद और दुराचरण के लिए नरक की आग। एक के लिए शुभ-सन्देश, दूसरे के लिए भय ! कहीं-कहीं बहती हुई नहरों का उल्लेख है। अथवा नरक की यातनाओं का विस्तृत वर्णन है और धमकी दी गई है कि नरक में सदैव (ख़ालिदून) रहना पड़ेगा इसी प्रकार स्वर्ग में भी।

इससे बड़ा प्रलोभन और इससे बड़ा भय क्या?

हर देश में विद्वान्, दार्शनिक या सच्चे अध्यात्म के प्रेमी तो बहुत कम होते हैं। सर्वसाधारण तो लौकिक विलासी जीवन के इच्छुक होते हैं। अरब की भी ऐसी ही दशा थी। हज़रत मुहम्मद साहेब के व्यावहारिक चातुर्य और नीति नैपुण्य का सब से प्रबल प्रमाण तो यह है कि साधारण अरबों को ललचाने और डराने के लिए स्वर्ग और नरक का यह चित्र खींच दिया। अरब जैसे गर्म और उजाड़ देश में जहां गर्म रेतीले मैदान, झुलसाने वाली गर्म लूएं, पानी की कमी आदि-आदि हों, वहां के लोगों के लिए बहने वाली नहरें, अच्छे-अच्छे मेवे, बड़ी आंखों वाली हूरें, मोती जैसे लौंडे और दोस्ताना हंसी मज़ाक, और शराब के प्यालों पर झपटा झपटी, और ऐसा करते हुए भी पाप के दोष से पृथक्त्व (लातासीम)। इनसे अधिक लालच की कौन सी चीज़ हो सकती है और इसी प्रकार जिस देश में रोज़ आग बरसती हो वहां नरक की ज्वाला और खौलता हुआ पानी पीने को मिले इससे अधिक डराने वाली कौन सी चीज़ हो सकती है?

यह तो हुई सर्वसाधारण की बात ! रहे कुछ थोड़े से विद्वान् ! वे सत्यता जानना चाहते हैं। उनके मन में स्वभावतः प्रश्न उठता है कि यह लालच और भय असली है अथवा कल्पित?  जैसे हउआ। क्या स्वर्ग और नरक कोई देश विशेष हैं?  क्या वे इसी जगत् में हैं या इसके बाहर?  इस जगत् से कितनी दूर?  क्या स्वर्ग और नरक इस समय भी विद्यमान हैं?  अथवा कयामत के दिन अथवा उसके निकट बनाये जायेंगे?

यदि इस समय हैं। और सज़ा और जज़ा (कर्मों के अशुभ या शुभ फल) का दिन होगा कयामत। सृष्टि के आरम्भ हुए अब तक सहस्रों वर्ष बीत गये। अभी वह दिन नहीं आया तो उन स्वर्ग और नरक में क्या हो रहा है?  ‘हूरें (अप्सराएं) क्या कर रही हैं?  और गिलमा (लौंडे) क्यों बनाये गये हैं?  यदि यह कोई विशेष स्थान नहीं हैं और केवल लक्षणा है तो जब तक अलङ्कारों को दूर करके सरल भाषा में असली बात बताई न जावे, मूर्खों की मूर्खता को बढ़ाना और उनको बहकाना होगा। मुसलमान मर्द भी हैं और मुसलमान औरतें भी। पुण्यात्मा और ईश्वर-पूजक स्त्रियों के पुण्यात्मा और ईश्वर-पूजक पति तो बड़ी बड़ी आंखों वाली हूरों से मित्रता करेंगे और ये पुण्यशीला और ईश्वर-भक्त बीबियां ! (खुदा जाने इनके दिल पर कैसे बीतेगी? )

इसके अतिरिक्त आध्यात्मिक उन्नति के लिए आवश्यक है कि भौतिक इच्छाओं से विरक्ति उत्पन्न की जाय। यदि किसी मौमिन (ईमान लाने वाले मुसलमान) ने इस दुनियां में भौतिक प्रलोभनों से केवल इसलिए परहेज़ किया कि इस प्रकार की चीजें स्वर्ग में मिलेंगी तो इच्छाएं तो ज्यों की त्यों बनी रहीं। वास्तविक न सही काल्पनिक ही सही। जो हूरों की इच्छा करके इस जीवन में व्यभिचार से परहेज़ करता है वह मानसिक व्यभिचार (mental adultery) का तो दोषी हो ही जाता है। इसी प्रकार के लालच और डर केवल कुरान तक ही परिमित नहीं हैं। और न हज़रत मुहम्मद साहेब के मस्तिष्क की कल्पना या घड़न्त हैं। अन्य धर्मों की पुस्तकों में भी ऐसे ही कल्पित स्वर्ग और नरक का चित्रण है। जो देश या काल की अपेक्षा से कुछ कुछ भिन्न हो गया है परन्तु उपनिषदों में जो भारतवर्ष के प्राचीन काल की आध्यात्मिक पुस्तकें समझी जाती हैं इस प्रकार के मन मोहक प्रलोभनों का खण्डन और निषेध किया गया है। जैसे एक उपनिषद् है कठ। उसमें अध्यात्म का श्रद्धालु ‘नचिकेता’ एक गुरु के पास जाता है और कहता है कि आप मुझे अध्यात्म का लोकोत्तर पाठ पढ़ाइये। गुरु जी पहले शिष्य की परीक्षा लेना चाहते हैं कि वस्तुतः यह लोक-सुख का इच्छुक है या अध्यात्म का। वे उसको कहते हैं कि ‘ऐसे कठिन प्रश्न से क्या लाभ?  मैं तुझ को ऐसे साधन बता सकता हूं कि तुझे लोक के सभी आनन्द प्राप्त हो जायें। बाग़ हों, झीलें हों, महल हों, सुन्दर ललनाएं हों,।’ शिष्य उत्तर देता है कि “इन नश्वर सुखों को लेकर मैं क्या करूंगा?  मैं तो अमर जीवन का इच्छुक हूं।” इसी प्रकार जब याज्ञवल्क्य विरक्त होकर संन्यासी होना चाहते हैं तो वे अपनी पत्नी मैत्रेयी से कहते हैं कि मैं तो बन को जाता हूं। तुम मेरे धन-धान्य को संभालो और मौज करो। मैत्रेयी कहती हैं कि महाराज मुझे लौकिक सुख नहीं चाहिये। ऐसी वस्तुओं को लेकर मैं क्या करूंगी जो अमरत्व की प्राप्ति में बाधक हैं। इस पर याज्ञवल्क्य मैत्रेयी को अध्यात्म का वास्तविक उपदेश देते हैं।

कहने का तात्पर्य यह है कि जो प्रलोभन स्वर्ग के चित्रण द्वारा दिया गया है वह मनुष्य के आचरण को बिगाड़ता तो है उसका सुधार नहीं करता। हिन्दू धर्म के पुराणों में राजा इन्द्र और उसकी अप्सराओं का उल्लेख है। इसी ने मुसलमान नवाबों के शासन काल में ‘इन्द्र सभा’ की ने नींव डाली। जिससे लोगों के सदाचार पर बुरा प्रभाव पड़ा। और कुरान के हूर और गिलमान की साधारण मुसलमानों के दिल पर अच्छा प्रभाव नहीं पड़ता। अतः इस युग के मुसलमान ने इस सार्वजनिक भावना को दूर करने का प्रयास किया है। सर सय्यद अहमद लिखते हैं- ‘बस यदि बहिश्त की हकीकत यही बाग़ और नहरें और मोती के और चांदी सोने की इंटों के मकान और दूध व शराब और शहद के समुद्र और लज़ीज़ मेवे और खूबसूरत औरतें और लौंडे हों तो यह तो कुरान की आयतों और खुदा के वचनों के बिल्कुल विरुद्ध हैं।’ सर सय्यद अहमद ने कुरान की दूसरी आयतों का प्रमाण देकर यह बताया है कि ये केवल उपमाएं और अलंकार हैं। न कि ‘बहिश्त की हकीकतें’।’ यदि सब मुसलमान विद्वान् सर्वसाधारण की इस भ्रांति के विरुद्ध आवाज़ उठावें तो स्वर्ग का जो कल्पित लालच और नरक का कल्पित और झूठा डर है वह दूर हो जाये। और लोगों की प्रवृत्ति शुभ आचरणों की ओर हो जाय।

यह कल्पित भवन ढह जायगा-

चाहे वह झूठा कुछ लोगों की धारणा है कि नरक का भय और स्वर्ग का प्रलोभन, और बनावटी ही क्यों न हो सर्वसाधारण को बहुत से पापों से बचता है। जैसे ‘हउआ’ के डर से बच्चे रोना बन्द कर देते हैं परन्तु हम को याद रखना चाहिये कि झूठ या कल्पना का नींव पर सदाचार और अध्यात्म का भवन खड़ा नहीं किया जा सकता।और यदि खड़ा किया जायगा तो अतिशीघ्र भयावह सिद्ध होगा। नरक और स्वर्ग के विपत्ति-जनक विचारों ने लोगों के दिलों में भ्रान्ति उत्पन्न कर दी है। ग़ालिब (उर्दू के प्रसिद्ध कवि) ने कहा था –

हम को मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन।

दिल के बहलाने को ‘गालिब’ यह ख़याल अच्छा है ॥

अन्धश्रद्धा वाले ही बहलाय व बहकाय जा सकते हैं –

दिल के बहलाने के लिए। किसके दिल के?  केवल उन्हीं के जो अन्धश्रद्धा के शिकार हैं और सत्य के प्रकाश में आने से घबराते हैं। यदि यह ठीक है कि

रास्ती मूजिबे रज़ाय खुदास्त !

(सत्य ईश्वर की प्रसन्नता का साधन है)

तो झूठ को ईश्वर की प्रसन्नता का बाधक मानना पड़ेगा कल्पित भय और झूठा लालच दिलाने वाले लोग स्वयं भी झूठ बोलते हैं। और दूसरों को झूठ बोलने की प्रेरणा करते हैं। कुरान शरीफ भी तो कहती है कि ‘मिथ्या कल्पना सच्चाई के सामने काम नहीं आती।।

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