क्या मनुस्मृति में प्रक्षेप हैं? (भाग 1)

मनुस्मृति के प्रक्षेपों पर विचार करने से पूर्व अन्य संस्कृत साहित्य के प्रक्षेप-विषयक इतिहास पर एक दृष्टिपात किया जाता है जिससे पाठकों को प्रक्षिप्तता की अनवरत प्रवृत्ति का ज्ञान हो सके।

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क्या मनुस्मृति में प्रक्षेप हैं? (भाग 1)
Dr. Surendra Kumar

लेखन कार्य पर अब तक आपको राष्ट्रीय और प्रान्तीय स्तर के नौ पुरस्कार/सम्मान प्राप्त हो चुके हैं, जिनमें आर्यसमाज सांताक्रुज, मुम्बई में प्रदत 'मेघजी भाई आर्य साहित्य लेखक पुरस्कार' तथा श्री विक्रम प्रतिष्ठान (अमेरिका) द्वारा प्रदत्त 'वेदवागीश पुरस्कार' विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। ... Know More


  • Apr 18 2022

प्राचीन भारतीय साहित्य की यह एक प्रमाणित ऐतिहासिक सच्चाई है कि उसमें समय-समय पर प्रक्षेप होते रहे हैं। इस विषयक प्रमाण पांडुलिपियों पर आधारित पाठान्तर और लिखित साक्ष्य के रूप में उपलब्ध हैं। अतः अब यह विषय विवाद का नहीं रह गया है। मनुस्मृति के प्रक्षेपों पर विचार करने से पूर्व अन्य संस्कृत साहित्य के प्रक्षेप-विषयक इतिहास पर एक दृष्टिपात किया जाता है जिससे पाठकों को प्रक्षिप्तता की अनवरत प्रवृत्ति का ज्ञान हो सके।

(अ) वाल्मीकीय रामायण

वाल्मीकीय रामायण के आज तीन संस्करण मिलते हैं- १. दाक्षिणात्य, २. पश्चिमोत्तरीय, ३. गौडीय या पूर्वीय। इन तीनों संस्करणों में अनेक सर्गों और श्लोकों का अन्तर है। गीताप्रेस, गोरखपुर से प्रकाशित दाक्षिणात्य संस्करण में अभी भी अनेक ऐसे सर्ग समाविष्ट हैं, जो मूलपाठ के साथ घुल-मिल नहीं पाये, अतः अभी तक उन पर “प्रक्षिप्त सर्ग’ लिखा मिलता है (उदाहरणार्थ द्रष्टव्य, उत्तरकाण्ड के ५९ सर्ग के पश्चात् दो सर्ग)।

नेपाल में, काठमांडू स्थित राष्ट्रीय अभिलेखागार में नेवारी लिपि में वाल्मीकीय रामायण की एक पांडुलिपि सुरक्षित है जो लगभग एक हजार वर्ष पुरानी है। उसमें वर्तमान संस्करणों से सैकड़ों श्लोक कम हैं। स्पष्टतः वे एक हजार वर्ष की अवधि में मिलाये गये हैं। समीक्षकों का मत है कि वर्तमान रामायण में प्राप्त बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड के अधिकांश भाग प्रक्षिप्त हैं। आज भी रामायण के आरम्भ में तीन अनुक्रमणिकाएं प्राप्त हैं, जो समयानुसार परिवर्धन का प्रमाण हैं। उनमें से एक में तो स्पष्टतः ‘षट्काण्डानि’ कहा है (५.२)। अवतारविषयक श्लोक अवतार की धारणा पनपने के उपरान्त प्रक्षिप्त हुए।

इस संदर्भ में एक बौद्ध ग्रन्थ का प्रमाण उल्लेखनीय है। बौद्ध साहित्य में एक ‘अभिधर्म महाविभाषा’ ग्रन्थ मिलता था। इसका तीसरी शताब्दी का चीनी अनुवाद उपलब्ध है। उसमें एक स्थान पर उल्लेख है कि “रामायण में बारह हजार श्लोक हैं”(डॉ० फादर कामिल बुल्के, ‘रामकथा : उत्पत्ति और विकास’, पृ० ९४) । आज उसमें पच्चीस हजार थोक पाये जाते हैं। यह एक संक्षिप्त जानकारी है कि प्राचीन ग्रन्थों में किस प्रकार प्रक्षेप होते रहे हैं।

(आ) महाभारत

अब मैं महाभारत के संदर्भ में एक महत्त्वपूर्ण प्रमाण उद्धृत करने जा रहा हूँ। यह इस तथ्य की जानकारी दे रहा है कि लगभग दो हजार वर्ष पूर्व महाभारत में होने वाले प्रक्षेपों के विरुद्ध तत्कालीन साहित्य में आवाज उठी थी। यह प्रमाण इस बात का भी ज्वलन्त प्राचीन साक्ष्य है कि प्राचीन भारतीय साहित्य में प्रक्षेप बहुत पहले से होते आ रहे हैं। गरुड़ पुराण (तीसरी शती) का निम्नलिखित श्रीक अमूल्य प्रमाण है जो यह बताता है कि दूसरी संस्कृति के जो लोग वैदिक संस्कृति में सम्मिलित हुए, उन्होंने अपने स्वार्थ-साधन के लिए भारतीय ग्रन्थों में प्रक्षेप किये हैं

दैत्याः सर्वे विप्रकुलेषु भूत्वा, कलौ युगे भारते षट्सहस्रयाम्।

निष्कास्य कांश्चित्, नवनिर्मितानां निवेशनं तत्र कुर्वन्ति नित्यम्॥

(ब्रह्मकाण्ड १.५९)

अर्थात्- ‘कलियुग के इस समय में महाभारत में परिवर्तनपरिवर्धन किया जा रहा है। दैत्यवंशी लोग स्वयं को ब्राह्मणकुल का बताकर कुछ शोकों को निकाल रहे हैं और उनके स्थान पर नयेनये शोक स्वयं रचकर निरन्तर डाल रहे हैं।’

इसी प्रकार की एक जानकारी महाभारत में दी गयी है कि स्वार्थी लोगों ने वैदिक-परम्पराओं को विकृत कर दिया है और उसके लिए उन्होंने ग्रन्थों से छेड़छाड़ की है। महाभारतकार की पीड़ा देखिए –

सुरा मत्स्याः पशोर्मासम्, आसवं कृशरौदनम्।

धूर्तेः प्रवर्तितं यज्ञे नैतद् वेदेषु विद्यते ॥

अव्यवस्थितमर्यादैः विमूढेर्नास्तिकैः नरैः।

संशयात्मभिरव्यक्तैः हिंसा समनुवर्णिता॥

(शान्तिपर्व २६५.९,४)

अर्थात् – ‘मदिरा सेवन, मत्स्य भोजन, पशुमांस-भक्षण और उसकी आहुति, आसव-सेवन, लवणान्न की आहुति, इनका विधान वेदों में (वैदिक संस्कृति में) नहीं है। यह सब धूर्त लोगों ने प्रचलित किया है। मर्यादाहीन, मद्य-मांसादिलोलुप, नास्तिक, आत्मा-परमात्मा के प्रति संशयग्रस्त लोगों ने गुपचुप तरीके से वैदिक ग्रन्थों में हिंसासम्बन्धी वर्णन मिला दिये हैं।’

महाभारत-महाकाव्य की कलेवर-वृद्धि का इतिहास स्वयं वर्तमान महाभारत में भी दिया गया है। महाभारत युद्ध के बाद महर्षि व्यास ने जो काव्य लिखा उसका नाम ‘जयकाव्य’ था ‘जयो नामेतिहासोऽयम्” (आदि० १.१; ६२.२०) और उसमें छह या आठ हजार लोक थे—‘अष्टौ लोकसहस्राणि अष्टौ लोकशतानि च” व्यासशिष्य वैशम्पायन ने उसको बढ़ाकर २४००० श्लोक का काव्य बना दिया और उसका नाम ‘भारत संहिता’ रख दिया-“चतुर्विंशती साहस्त्रीं चक्रे भारतसंहिताम्” (आदि० १.१०२)। सौति ने इसमें परिवर्धन करके इसे एक लाख लोकों का बना दिया और इसका नाम ‘महाभारत’ रखा- “शतसाहस्त्रमिदं काव्यं मयोक्तं श्रूयतां हि वः” (आदि० १.१०९ )। यह ‘जय’ से महाभारत बनने की महाभारत में वर्णित कथा है। लोग अपना पृथक् काव्य बनाने के बजाय उसी में वृद्धि करते गये। इससे उसकी प्रामणिकता का ह्रास हुआ, और ऐतिहासिकता विनष्ट हो गयी।

(इ) गीता

गीता महाभारत का ही अंश है। उसकी वर्तमान विशालता व्यावहारिक नहीं है। युद्धभूमि में कुछ मिनटों के लिए दिया गया उपदेश न तो इतना विस्तृत हो सकता है और न प्रकरण के अनुकूल। यदि उसको ‘संक्षेप का विस्तार’ कहा जायेगा तो वह व्यास या कृष्णप्रोक्त नहीं रह जायेगा। प्रत्येक दृष्टि से वह परिवर्धित अर्थात् प्रक्षिप्त रूप है।

(ई) निरुक्त

आचार्य यास्ककृत निरुक्त के १३-१४ अध्यायों के विषय में समीक्षकों का यह मत है कि वे अभाव की पूर्ति के लिए बाद में जोड़े गये हैं। उन सहित निरुक्त परिवर्धित संस्करण है।

(उ) चरकसंहिता

महर्षि अग्निवेश प्रणीत चरकसंहिता में भी उनके शिष्यों ने अन्तिम अध्यायों का कुछ भाग अभाव की पूर्ति की दृष्टि से संयुक्त किया है। किन्तु वहां यह स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि यह भाग अमुक का है। फिर भी उससे परिवर्धन की प्रवृत्ति और इतिहास की जानकारी मिलती है।

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