क्या मनुस्मृति में प्रक्षेप हैं? (भाग 2)

इसी प्रकार मनुस्मृति में भी समय-समय पर प्रक्षेप हुए हैं। अपितु, मनुस्मृति में अधिक प्रक्षेप हुए हैं क्योंकि उसका सम्बन्ध हमारी दैनंदिन जीवनचर्या से था

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क्या मनुस्मृति में प्रक्षेप हैं? (भाग 2)
Dr. Surendra Kumar

लेखन कार्य पर अब तक आपको राष्ट्रीय और प्रान्तीय स्तर के नौ पुरस्कार/सम्मान प्राप्त हो चुके हैं, जिनमें आर्यसमाज सांताक्रुज, मुम्बई में प्रदत 'मेघजी भाई आर्य साहित्य लेखक पुरस्कार' तथा श्री विक्रम प्रतिष्ठान (अमेरिका) द्वारा प्रदत्त 'वेदवागीश पुरस्कार' विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। ... Know More


  • Apr 18 2022

(ऊ) मनुस्मृति

इसी प्रकार मनुस्मृति में भी समय-समय पर प्रक्षेप हुए हैं। अपितु, मनुस्मृति में अधिक प्रक्षेप हुए हैं क्योंकि उसका सम्बन्ध हमारी दैनंदिन जीवनचर्या से था और उससे जीवन व समाज सीधा प्रभावित होता था, अतः उसमें परिवर्तन भी किया जाना स्वाभाविक था। जैसे भारत के संविधान में छियासी के लगभग संशोधन आवश्यकता के नाम पर आधी शती में हो चुके हैं। इसी प्रकार मनुस्मृति में निम्नलिखित प्रमुख कारणों के आधार पर परिवर्तन-परिवर्धन किये जाते रहे –

१. अभाव की पूर्ति के लिए

२. स्वार्थ की पूर्ति के लिए

३. गौरव-वृद्धि के लिए

४. विकृति उत्पन्न करने के लिए

ये प्रक्षेप (परिवर्तन या परिवर्धन) अधिकांश में स्पष्ट दीख जाते हैं। महर्षि मनु सदृश धर्मज्ञ और विधिप्रदाता की रचना में रचनादोष नहीं हो सकते, किन्तु प्रक्षिप्तों के कारण आ गये हैं। वे प्रक्षिप्त कहीं विषयविरुद्ध, कहीं प्रसंगविरुद्ध, कहीं परस्परविरुद्ध, कहीं शैलीविरुद्ध रूप में दीख रहे हैं। आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट, खारी बावली, दिल्ली-६ से प्रकाशित मेरे शोध और भाष्ययुक्त ‘सम्पूर्ण मनुस्मृति’ संस्करण में मैंने उनकी पहचान निम्नलिखित सात साहित्यिक मानदण्डों के आधार पर की है। वे हैं –

१. विषयविरोध

२. प्रसंगविरोध

३. अवान्तरविरोध

४. पुनरुक्ति

५. शैलीविरोध

६. वैदविरोध

प्रक्षिप्तानुसन्धान के इन साहित्यिक मानदण्डों के आधार पर मनुस्मृति के उपलब्ध २६८५ श्लोकों में से १४७१ प्रक्षिप्त सिद्ध हुए हैं और १२१४ मौलिक। विस्तृत समीक्षा के लिए मनुस्मृति का उक्त संस्करण पठनीय है। उसमें प्रत्येक प्रक्षिप्त—सिद्ध शोक पर समीक्षा में उपर्युक्त तटस्थ मानदण्डों के आधार पर प्रक्षेप का कारण दर्शाया गया है।

मनुस्मृति में प्रक्षेप होने की पुष्टि अधोलिखित प्रमाण भी करते हैं और प्रायः सभी वर्गों के विद्वान् भी करते हैं –

(क) मनुस्मृति-भाष्यकार मेधातिथि (९वीं शताब्दी) की तुलना में कूल्लूक भट्ट (१२वीं शताब्दी) के संस्करण में एक सौ सत्तर लोक अधिक उपलब्ध हैं। वे तब तक मूल पाठ के साथ घुल-मिल नहीं पाये थे, अतः उनको बृहत् कोष्ठक में दर्शाया गया है। अन्य टीकाओं में भी कुछ-कुछ श्लोकों का अन्तर है।

(ख) मेधातिथि के भाष्य के अन्त में एक श्रीक मिलता है, जिससे यह जानकारी मिलती है कि मनुस्मृति और उसका मेधातिथि भाष्य लुप्तप्रायः था। उसको विभिन्न संस्करणों की सहायता से सहारण राजा के पुत्र राजा मदन ने पुन: संकलित कराया। ऐसी स्थिति में लोकों में क्रमविरोध, स्वल्प–आधिक्य होना सामान्य बात है

मान्या कापि मनुस्मृतिस्तदुचिता व्याख्यापि मेघातिथेः।

सा लुप्तैव विधेर्वशात् क्वचिदपि प्राप्यं न तत्पुस्तकम्।

क्षोणीन्द्रो मदनः सहारणसुतो देशान्तरादाहृतैः,

जीर्णोद्धारमचीकरत्तत इतस्तत्पुस्तकैः लेखितैः॥

(उपोद्घात, मेघातिथिभाष्य, गंगानाथ झा खण्ड ३, पृ० १)

अर्थात्- ‘समाज में मान्य कोई मनुस्मृति थी, उस पर मेघातिथि का भाष्य भी था किन्तु वह दुर्भाग्य से लुप्त हो गयी। वह कहीं उपलब्ध नहीं हुई। सहारण के पुत्र राजा मदन ने विभिन्न देशों से उसके संस्करण मंगाकर उसका जीर्णोद्धार कराया और विभिन्न पुस्तकों से मिलान कराके यह भाष्य तैयार कराया।

मनुस्मृति के स्वरूप में परिवर्तन का यह बहुत महत्त्वपूर्ण प्रमाण है।

(ग) आर्यसमाज के प्रवर्तक महर्षि दयानन्द ने अपने ग्रन्थों में गत शती में सर्वप्रथम यह सुस्पष्ट घोषणा की थी कि मनुस्मृति में अनेक प्रक्षेप ऐसे किये गये हैं, जैसे कि ग्वाले दूध में पानी की मिलावट करते हैं। उन्होंने अपने ग्रन्थों में कुछ प्रक्षिप्त श्रोकों का कारणपूर्वक दिग्दर्शन भी कराया है। उन्होंने घोषणा की थी कि मैं प्रक्षेपरहित मनुस्मृति को ही प्रमाण मानता हूं (ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका, ग्रन्थप्रामाण्य विषय)

(घ) सम्पूर्ण भारतीय प्राचीन साहित्य में प्रक्षिप्तों के होने के यथार्थ को सुप्रसिद्ध सनातनी आचार्य स्वामी आनन्दतीर्थ ‘महाभारत तात्पयार्थ—निर्णय’ में स्पष्ट रूप से स्वीकार करते हैं –

क्वचिद् ग्रन्थान् प्रक्षिपन्ति क्वचिदन्तरितानपि,

कुर्युः क्वचिच्च व्यत्यासं अनुत्सन्नाः प्रमादात् क्वचिदन्यथा।

अनुत्सन्नाः अपि ग्रन्थाः व्याकुलाः सन्ति सर्वशः,

उत्सन्नाः प्रायशः सर्वे, कोट्यंशोऽपि न वर्तते ॥ (अ०२)

अर्थ— ‘कहीं ग्रन्थों में प्रक्षेप किया जा रहा है, कहीं मूल पाठों को बदला जा रहा है, कहीं आगे-पीछे किया जा रहा है, कहीं प्रमादवश अन्यथा लेखन किया जा रहा है, जो ग्रन्थ नष्ट होने से बच गये हैं वे इन पीड़ाओं से व्याकुल हैं (=क्षत-विक्षत हैं)। अधिकांश ग्रन्थों को नष्ट किया जा चुका है। अब तो साहित्य का करोड़वां भाग भी विशुद्ध नहीं बचा है।’

यही क्षत-विक्षत स्थिति मनुस्मृति की हुई है।

(ङ) प्रथम अध्याय में पृ० १२ पर चीन की दीवार से प्राप्त जिस चीनी भाषा के ग्रन्थ की जानकारी दी गयी है। उसमें कहा गया है कि मनुस्मृति में ६८० श्लोक हैं। यह अत्यन्त प्राचीन सूचना है। यदि इसको सही मानें तो अभी मनुस्मृति के प्रक्षेपानुसन्धान की और आवश्यकता है।

(च) पाश्चात्य शोधकर्ता वूलर, जे. जौली, कीथ, मैकडानल आदि ने मनुस्मृति-सहित प्राचीन भारतीय साहित्य में प्रक्षेपों का होना सिद्धान्ततः स्वीकार किया है। जे. जौली ने कुछ प्रक्षेप दर्शाये भी हैं।

(छ) मनुस्मृति के कुछ भाष्यकारों एवं समीक्षकों ने प्रक्षिप्त श्लोकों की संख्या इस प्रकार मानी है –

विश्वनाथ नारायण माण्डलीक १४८

हरगोविन्द शास्त्री १५३

जगन्नाथ रघुनाथ धारपुरे १००

जयन्तकृष्ण हरिकृष्णदेव  ५९

(ज) मनुस्मृति के प्रथम पाश्चात्त्य समीक्षक न्यायाधीश सर विलियम जोन्स उपलब्ध २६८५ शोकों में से २००५ शोकों को प्रक्षिप्त घोषित करते हैं। उनके मतानुसार ६८० शोक ही मूल मनुस्मृति में थे।

(झ) महात्मा गांधी ने अपनी ‘वर्णव्यवस्था’ नामक पुस्तक में स्वीकार किया है कि वर्तमान मनुस्मृति में पायी जाने वाली आपत्तिजनक बातें बाद में की गयी मिलावटें हैं।

(ञ) भारत के पूर्व राष्ट्र पति और दार्शनिक विद्वान् डॉ० राधाकृष्णन्, श्री रवीन्द्रनाथ टैगोर आदि भी मनुस्मृति में प्रक्षेपों का अस्तित्व स्वीकार करते हैं।

#Manusmriti

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