क्या वेदों की रचना ऋषियों ने की है ?

मेरी दृष्टि में “वेदवाणी" में ऐसी लेखमाला जो महर्षि दयानन्द जी के वेद विषयक मन्तव्यों से विरुद्ध वेदों को ऋषियों द्वारा रचित, पौरूषेय, तथा मानवीय अनित्य इतिहास युक्त ग्रन्थ बताती हो, प्रकाशन करने योग्य नहीं है। और यदि प्रकाशित करनी ही हो तो आवश्यक सम्पादकीय टिप्पणियों के साथ करना चाहिए ताकि अनावश्यक भ्रम उत्पन्न न हो।

Comparative Sutdy Featured Hinduism Scriptures Vedas Vedic Dharma
क्या वेदों की रचना ऋषियों ने की है ?
Bhavesh Merja

आप वैदिक वाङ्मय के स्वाध्याय में रूचिकर व्यकतित्व के धनि हैं. आप द्वारा बहुत से लेख गए हैं. आप ने कुछ पुस्तकों महत्वपूर्ण पुस्तकों का गुजराती भाषा में अनुवाद भी किया है. ... Know More


  • Apr 22 2022

श्री रामलाल कपूर ट्रस्ट की वेदवाणी मासिक पत्रिका में जून 2021 से अहमदाबाद निवासी श्री कपिलदेव जी ओझा की “यजुर्वेद का अवलोकन”लेखमाला क्रमशः प्रकाशित हो रही है। इस लेखमाला में लेखक ने वेद मन्त्रों के तात्पर्य इस प्रकार से व्यक्त किए हैं कि जैसे वेद ईश्वर प्रोक्त या अपौरुषेय नहीं, बल्कि ऋषियों द्वारा रचित, पौरुषेय हो। मुझे वेदों के तात्पर्य को इस शैली में प्रस्तुत करने की शैली स्वामी दयानन्द सरस्वती जी की वेदार्थ शैली एवं सिद्धान्त से विपरीत प्रतीत हुई।

श्री ओझा जी ने वेदवाणी के जुलाई 2021 के अंक में प्रकाशित अपने लेख में निम्न प्रकार के वाक्यों का प्रयोग किया है –

“यजुर्वेद माध्यन्दिन वाजसनेयी शाखा में कुल 1975 मन्त्र, 40 अध्याय, जिन पर 380 ऋषियों ने विविध 628 विषयों पर अपने दर्शन व्यक्त किये हैं।” (पृ. 30)

ज्ञातव्य है कि जिन ऋषियों के नाम वेद की मन्त्र संहिताओं में लिखे गए हैं, उनके सम्बन्ध में स्वामी दयानन्द का मत अत्यन्त ही स्पष्ट है कि ये वही पुरातन ऋषि हैं, जिन्होंने इन-इन वेद मन्त्रों के अर्थ को सर्वप्रथम जानकर प्रकाशित किया, इस बात के स्मरण के लिए इन ऋषियों के नाम वेदों में लिखे गए हैं। सत्यार्थ प्रकाश के सप्तम समुल्लास में स्वामी दयानन्द ने लिखा है – “ऋषयो मन्त्रदृष्टयः मन्त्रान् सम्प्रादुः – जिस-जिस मन्त्रार्थ का दर्शन जिस-जिस ऋषि को हुआ और प्रथम ही जिसके पहले उस मन्त्र का अर्थ किसी ने प्रकाशित नहीं किया था; किया और दूसरों को पढ़ाया भी। इसलिये अद्यावधि उस-उस मन्त्र के साथ ऋषि का नाम स्मरणार्थ लिखा आता है। जो कोई ऋषियों को मन्त्रकर्त्ता बतलावें उन को मिथ्यावादी समझें। वे तो मन्त्रों के अर्थप्रकाशक हैं।” स्वामी दयानन्द ने इन ऋषियों को मन्त्र की रचना करने वाले नहीं लिखा है, और न ही ऐसा लिखा है कि इन वेद मन्त्रों में उन ऋषियों का “दर्शन” वर्णित है। इसलिए श्री ओझा जी की यह बात कि इन वेद मन्त्रों में ऋषियों ने अपना “दर्शन” व्यक्त किया है, स्वामी दयानन्द के मन्तव्य से विपरीत है और वेदों की महनीयता या दिव्यता को ठेस पहुंचाने वाली है। यदि श्री ओझा जी ने यह बात षड्दर्शन (उपांग) के सम्बन्ध में लिखी होती तो इसमें कोई समस्या नहीं होती; क्योंकि इन दर्शन शास्त्रों में कपिल, कणाद आदि ऋषियों का दर्शन व्यक्त या प्रकट हुआ है। परन्तु वेदों को ऋषियों का “दर्शन” बताना तो नि:संदेह आपत्तिजनक है ही। वेद मन्त्र ईश्वरीय ज्ञान को, ईश्वरीय दर्शन को व्यक्त करते हैं, वे किसी मानवीय प्रज्ञा या व्यक्तिगत दर्शन को व्यक्त नहीं करते हैं।

जुलाई के अंक में यजुर्वेद के प्रथम अध्याय के प्रथम मन्त्र की चर्चा करते हुए श्री ओझा जी ने लिखा है कि – यजुर्वेद के प्रथम मन्त्र में “ही मानो यह वैदिक ऋषि हमें…कर्म की आवश्यकता दिखाते हैं।” (पृ. 30) ऐसी बात लिखना वेदों को ऋषि कृत दिखाना ही है। अन्यथा ऐसा भी तो लिखा जा सकता था कि इस मन्त्र में ईश्वर ने हमें कर्म की आवश्यकता का ज्ञान दिया है। क्योंकि इस मन्त्र में जो ज्ञान निहित है, उसका मूल प्रकाशक या स्रोत तो ईश्वर है, कोई ऐतिहासिक ऋषि नहीं। ऋषि तो इस मन्त्र के अर्थ को समझने एवं अन्य मनुष्यों में उस अर्थ को प्रसारित, प्रचारित करनेवाले होते हैं।

इसी अंक के पृ. 31 पर श्री ओझा जी ने लिखा है – “मन्त्र 2 में ऋषि कहते हैं – वसो: पवित्रमसि।” (यजुर्वेद 1.2) । अब विचार कीजिए कि क्या यह मन्त्र ऋषि द्वारा कहा गया है? क्या इसका प्रकाशक ईश्वर नहीं है? सत्य तो यह है कि ऋषि ने तो “वसो: पवित्रमसि।” – इन शब्दों का, मन्त्र का अर्थ या तात्पर्य जानने का प्रयास किया है कि ईश्वर इन शब्दों से, इस मन्त्र से हमें क्या ज्ञान कराना चाहता है। फिर वेद मन्त्र को उद्धृत करते हुए ऐसा लिखना कि “ऋषि कहते हैं…”, स्वामी दयानन्द की विचारधारा से प्रतिकूल शैली है, जो कुछ पाठकों को दिग्भ्रमित भी कर सकती है। श्री ओझा जी ने अपनी इस लेखमाला में सर्वत्र यही गलत शैली प्रयुक्त की है। वे वेद मन्त्रों को उद्धृत करते हुए ऐसा ही लिखते हैं। जैसे कि –

“ऋषि हमारा आत्मविश्वास बढ़ाता हुआ हमें कहता है – तेजोऽसि” (यजुर्वेद 1.31, जुलाई का अंक, पृ. 32), “ये कृपालु ऋषि हमें यज्ञ का महत्त्व समझाते हुए कहते हैं – … अग्नये त्वा जुष्टं प्रोक्षामि” (यजुर्वेद 2.1, अगस्त का अंक, पृ. 29), “इसी यज्ञ-भावना को दोहराते हुए ऋषि परमेष्ठी प्रजापति जी ने अग्नि, जिसमें हवि डाली जाती है, इस विषय पर हमें बोध दिया।” (वही, पृ. 29), इत्यादि। यह तो सत्य है कि वेद में परमेष्ठी प्रजापति का नाम ऋषि के रूप में स्मरण अर्थ लिखा हुआ पाया जाता है, परन्तु इस ऋषि ने इस मन्त्र का क्या अर्थ ग्रहण किया था, इसका प्रामाणिक विवरण तो हमें आज कहीं पर भी उपलब्ध नहीं होता है। फिर यह लिखना कि – ऋषि परमेष्ठी प्रजापति जी ने हमें यह बोध दिया, भ्रम की सृष्टि करने तुल्य ही तो है। हां, यदि उन ऋषियों ने कि जिनका नामोल्लेख वेदों में किया गया है, उन्होंने संसार में सर्वप्रथम वेद मन्त्रों का क्या अर्थ प्रकाशित किया था, यह हमें ज्ञात या उपलब्ध होता, तो उनके द्वारा प्रकाशित किए गए उन अर्थों को हम उन ऋषियों के नाम से उद्धृत कर सकते थे; परन्तु हमें तो आज यह पता ही नहीं है कि उन ऋषियों ने वेद मन्त्रों के क्या अर्थ ग्रहण एवं प्रकाशित किए थे। ऐसे में हम वेद मन्त्रों को उन ऋषियों के द्वारा कथित कैसे बता सकते हैं? ऐसा करना तो न्यायोचित नहीं होगा।

श्री ओझा जी आगे लिखते हैं – “इसके साथ ऋषि हमें मन्त्र 6 से प्रार्थना भी सिखलाते हैं – अग्नि स्वरूप देव ! पाहि यज्ञं पाहि यज्ञपतिं पाहि मां यज्ञन्यम्” (यजुर्वेद 2.6, वही, पृ. 30) इसमें भी वही शैली दोष है। प्रार्थना कैसे, कब और किन शब्दों से, किस से की जानी चाहिए – मनुष्य को इसका ज्ञान सर्व प्रथम ईश्वर ने ही वेदों के माध्यम से दिया है। इस मूल सत्य को प्रकट न कर या इसे छिपाकर ऋषियों को वेद मन्त्रों के कर्ता बताना सर्वथा अनुचित है।

श्री ओझा जी ने लिखा है – “यज्ञ का और अग्नि का इतना महत्त्व सुनकर हम जिज्ञासुओं ने ऋषि परमेष्ठी प्रजापति जी को प्रश्न किया कि – इस यज्ञ से क्या लाभ है? इस पर ऋषि ने कहा (मन्त्र 10), इन्द्रियं रायं दधातु” (यजुर्वेद 2.10, वही, पृ. 30) क्या वास्तव में वेदों में किसी परमेष्ठी प्रजापति नामक ऐतिहासिक ऋषि से हुए इस प्रकार के प्रश्नोत्तर का वर्णन है? क्या ऐसी काल्पनिक बातें लिखने से वेदों में अनित्य इतिहास की उपस्थिति बताकर हम स्वामी दयानन्द के अनुयायी ही वेद विषयक उनके मन्तव्य के विरुद्ध नहीं जा रहे हैं? क्या वेदों को लेकर इस प्रकार की शब्दावली का प्रयोग हमें स्वामी दयानन्द के ग्रन्थों में कहीं भी उपलब्ध होता है? क्या वेदों के प्रचार के लिए, उन्हें जनप्रिय बनाने के लिए हम स्वामी दयानन्द से भी अधिक लालायित और समर्पित हैं? हमें यह देखना होगा कि रोचकता के नाम पर हम कहीं अपने ही सिद्धान्तों की हानि नहीं कर रहे हैं? इसी रोचकता की लिप्सा ने ही ठोस वैदिक सिद्धान्तों को तिरोहित किया है। सम्भवतः पुराण आदि वेदविरुद्ध ग्रन्थों के निर्माण के पीछे भी रोचकता की यही लिप्सा कारणभूत रही होगी। इसलिए भलाई इसी में है कि हम स्वामी दयानन्द के मन्तव्यों के विरुद्ध जाकर वेदों को ऐसी शैली में वर्णित या प्रस्तुत न करें कि जिससे लोगों में भ्रान्ति फैले।

यह देखकर मुझे आश्चर्य होता है कि पण्डित ब्रह्मदत्त जी जिज्ञासु जैसे प्रसिद्ध आर्य विद्वान् के पास अध्ययन करने वाले डॉ. सुद्युम्न जी आचार्य जैसे प्रसिद्ध विद्वान् आजकल फेसबुक पर वेदों में “प्रवाह नित्य इतिहास” के नाम से मानवीय अनित्य इतिहास का पक्ष पोषण करते हुए दिखाई पड़ते हैं। वे ऐसा बताते हैं कि सृष्टि उत्पन्न होने के पश्चात् जब मनुष्य ने कृषि के लिए हल आदि उपकरण बनाएं, उसके पश्चात् उन उपकरणों का उल्लेख वेदों में किया गया है। अर्थात् वेदों में मानवीय उपलब्धियों का इतिहास है। ज्ञातव्य है कि डॉ. सुद्युम्न आचार्य जी वेदवाणी के परामर्शदाता मण्डल के सदस्य हैं। जब हमने वेदवाणी में प्रकाशित श्री ओझा जी की इस विवेच्य लेखमाला की समलोचना करता हुआ एक संक्षिप्त लेख फेसबुक पर प्रस्तुत किया तो तुरन्त ही डॉ. सुद्युम्न जी ने अपनी टिप्पणी में लिखा – “यह एक दृष्टि है। एकांगिता से बचने के लिये ऐसे दृष्टिकोण का प्रचार होना ही चाहिए। हम कब तक एक कोने में बैठे रहना पसन्द कर सकते हैं। ऋषि के कहने का अर्थ उनके द्वारा प्रवचन या व्याख्या करना है। ‘वैज्ञानिक ऋषि भारद्वाज ने अपने मन्तव्य को इस मन्त्र के आधार पर प्रस्तुत किया’ इस कथन में क्या आपत्ति होना चाहिए।” स्वामी दयानन्द जैसे आप्त पुरुष के मन्तव्य के प्रति श्रद्धा रखने को, उस पर एकनिष्ठ रहने को डॉ. सुद्युम्न जी “एकांगिता” तथा “एक कोने में बैठे रहना” समझते हैं? चलिए अब देखते हैं कि श्री ओझा जी ने यहां क्या लिखा है। वे लिखते हैं – “…वैज्ञानिक ऋषि भरद्वाज जी ने (मन्त्र 3) से कहा – इस अग्नि को हम ‘समिद्भिः घृतेन वर्धयामसि’ अर्थात् काष्ठ की (समिधा से) घी से संयुक्त करके बढ़ावें। इस पर ऋषि प्रजापति जी ने कहा – जुषस्व समिधो मम (मन्त्र 4) ” (वेदवाणी सितम्बर – 2021, पृ. 27) अब विचार कीजिए कि क्या यजुर्वेद के ये मन्त्र भरद्वाज, प्रजापति आदि ऋषियों के द्वारा कहे या प्रकाशित किए गए हैं? क्या इन ऋषियों ने इन मन्त्रों का जो अर्थ समझा था, इसका कोई विवरण हमें वर्तमान में प्राप्त होता है? जब नहीं होता है, तो उनके नाम से यह लिखना कि ये ऋषि ही ये मन्त्र कह रहे हैं, या उनके नाम से वेद मन्त्र का तात्पर्य बताना कहां तक न्यायोचित ठहरता है? बस, इसी कल्पनामूलक शैली में श्री ओझा जी ने विरूप आंगिरस, अथर्वा, देवल, वामदेव, अवत्सार, सुबन्धु, श्रुतबन्धु, देववात-भरत, सर्पराज्ञी आदि विभिन्न ऋषियों के नामों का उल्लेख अपनी इस लेखमाला में किया है कि जैसे ये ऋषि लोग ही वेद मन्त्रों के कर्ता या प्रकाशक थे। जैसे कि –

“इस पर अब तक शांत भाव से बैठे हुए आर्ष द्रष्टा ऋषि देवल ने कहा – अग्नेः प्रियं पाथोऽपीतम्, मा अपचेतयातै (यजुर्वेद 2.17, अगस्त का अंक, पृ. 31)

पुनः ऋषि परमेष्ठी प्रजापति जी ने कहा, हे विद्वानो ! धैर्यवानो ! तुम इन उपदेशों से उत्तम क्रिया को प्राप्त करके, बृहन्तः प्रस्तरेष्ठाः विश्वदेवाः परिधेयाः मादयध्वम् (यजुर्वेद 2.18, वही, पृ. 31)

“इसी भाव को दुहराते हुए ऋषि वामदेव जी ने हमें सम्बोधन दिया…” ऐसा लिखकर साथ में यजुर्वेद (2.30) का‘ये रूपाणि…’यह मन्त्र उद्दृत कर दिया। (वही, पृ. 32)

“अपने वक्तव्य के अगले तीन मन्त्र (31, 32, 33) में ऋषि वामदेव जी ने हमें पितृ-सेवा का उत्तम बोध दिया।” ऐसा लिखकर यहां यजुर्वेद के (2.31,32) मन्त्र उद्धृत किए हैं (वही, पृष्ठ 32) अब हमें विचार करना होगा कि क्या वामदेव ऋषि ने इस मन्त्र के माध्यम से हमें पितृ-सेवा का उत्तम बोध दिया – इस बात का कोई प्रमाण या आधार आज उपस्थित किया जा सकता है? इस ऋषि का नाम वेद में स्मरण अर्थ पढ़ा गया है, इससे यह तो हम निस्संकोच कह सकते हैं कि पुराकाल में इस नाम के एक मन्त्रार्थ दृष्टा ऋषि हुए थे, परन्तु इस ऋषि ने इस मन्त्र विशेष में क्या दर्शन किया, इस मन्त्र विशेष का क्या अर्थ या प्रयोजन समझा, लोगों को बताया, पढ़ाया – क्या यह जानने का कोई साधन वर्तमान में हमारे पास उपलब्ध है? मैं समझता हूं कि नहीं है। फिर उनके नाम से ऐसी बातें लिखने को कैसे न्यायोचित कहा जा सकता है? यदि ऐसी बात स्वामी दयानन्द के वेद भाष्यों के आधार पर की जाती कि इस मन्त्र का उन्होंने (स्वामी जी ने) यह अर्थ किया है, अथवा इस मन्त्र का भाष्य करते हुए उनको (स्वामी जी को) इस वेद मन्त्र में यह प्रेरणा ज्ञानगोचर हुई, तो इसमें कुछ भी अनुचित नहीं है। परन्तु पुराकाल के जिन मन्त्रार्थ दृष्टा ऋषिओं के हमें केवल नाम ही ज्ञात हैं और उन्होंने वेद मन्त्र के अर्थ का जो दर्शन या ज्ञान किया था, इसके बारे में हमें आज कुछ भी विदित नहीं है, उनके लिए इस प्रकार से लिखना कि जिस प्रकार से श्री ओझा जी ने अपनी इस लेखमाला में लिखा है, वह सर्वथा अनुचित ही माना जाएगा।

श्री ओझा जी ने लिखा है – “कहते हैं वेद (यजुर्वेद) अपौरुषेय है और परमकृपालु परमात्मा की प्रेरणा से यह ज्ञान वायु ऋषि को प्राप्त हुआ, उन्होंने इसे अपने मेधावी ऋषि तुल्य ऐसे परमेष्ठी प्रजापति, देवल और वामदेव को दिया। इस संगठित ज्ञान से यजुर्वेद का निर्माण किया।” (वही, पृष्ठ 32) यहां श्री ओझा जी ने प्रथम तो ठीक लिखा कि “परमात्मा की प्रेरणा से यह ज्ञान वायु ऋषि को प्राप्त हुआ”, परन्तु साथ में तुरन्त ही विचित्र बात लिख दी कि – परमेष्ठी प्रजापति, देवल और वामदेव आदि के “इस संगठित ज्ञान से यजुर्वेद का निर्माण किया।” अब विचार कीजिए, क्या सृष्टि के आरम्भ में हुए यजुर्वेद के प्रकाश या आविर्भाव में इन परमेष्ठी प्रजापति, देवल और वामदेव आदि ऐतिहासिक ऋषियों की कोई भूमिका कल्पित की जा सकती है? यदि बिना कोई प्रमाण या आधार ऐसा मान लिया जाए, तो क्या हम फिर वेदों को अपौरुषेय कह सकने की स्थिति में रह पाएंगे?

इस बात का निषेध नहीं किया जा सकता कि वेदों में विभिन्न प्रकार की वर्णन शैलियां पाई जाती हैं, जिनका दिग्दर्शन डॉ. रामनाथ जी वेदालंकार आदि आर्य पण्डितों ने अपने ग्रन्थों में किया हैं। तदनुसार हमें वेदों में कहीं ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे ईश्वर सीधा मनुष्यों को उपदेश कर रहा है, कहीं लगता है कि कोई राजा अपनी प्रजा को आदेश दे रहा है, कहीं लगता है कि कोई न्यायाधीश या योगी बोल रहा है, या कोई वैद्य-रोगी, आचार्य-शिष्य पति-पत्नी, भाई-बहिन आदि कुछ बातें कर रहे हैं या उनके बीच कोई सम्वाद चल रहा है; परन्तु इससे यह समझ लेना कि वेदों में किसी ऐतिहासिक राजा, प्रजा, न्यायाधीश, वैद्य आदि का सम्वाद वर्णित है, महर्षि दयानन्द की वेद विषयक प्रमुख अवधारणा से नितान्त विरुद्ध मान्यता ही मानी जाएगी। श्री ओझा जी ने अपनी लेखमाला में ऐसा ही किया है और स्थान स्थान पर इसी गलत शैली का प्रयोग करते हुए ऐसे वाक्य लिखे हैं कि जैसे ये ऋषि लोग ही वेद के कर्ता हैं और इन वेद मन्त्रों में जो कुछ ज्ञान-विज्ञान तथा प्रेरणा आदि तत्त्व हमारे संज्ञान में आते हैं उन सब का मूल स्रोत ये ऋषिगण ही है। अपने लेखन में रोचकता पैदा करने में स्वामी दयानन्द द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्त को हानि पहुंच रही है, यह बात सम्भवतः वे भूल ही गए हैं।

वेदवाणी के सितम्बर 2021 के अंक में श्री ओझा जी ने यजुर्वेद (11.32) मन्त्र में आए हुए अथर्वा”पद को किसी ऐतिहासिक अर्थवा नामक ऋषि का वाचक समझकर उन्हें अग्नि का आविष्कारक भी बता दिया है। उन्होंने लिखा है – “विश्व के सर्वप्रथम वैज्ञानिक अथर्वा ऋषि ने इस अग्नि का आविष्कार किया। यजु. 11.32 में लिखा है – त्वामग्ने पुष्करादध्यथर्वा निरमन्थत अर्थात् – अथर्वा ऋषि ने सर्वप्रथम अरणि नामक वृक्ष की लकड़ियों को रगड़ (मन्थन) कर अग्नि उत्पन्न किया।”(पृ. 25) इस प्रकार श्री ओझा जी ने वेदों में मानवीय अनित्य इतिहास भी खोज निकाला ! क्या ऐसी बातें स्वामी दयानन्द के वेद तथा वेदार्थ विषयक मन्तव्यों के अनुकूल हैं? इसका विचार तो हमें करना ही होगा।

वेदवाणी के अक्टूबर 2021 के अंक में “यजुर्वेद का अवलोकन – आक्षेप-समाधान”लेख से श्री ओझा जी ने मेरे द्वारा उठाई गई आपत्तियों का समाधान करने का प्रयास किया है और डॉ. रामनाथ जी वेदालंकार के “वेदों की वर्णनशैलियां”ग्रन्थ के कई उद्धरण दिए हैं, जिनका मेरे उपर्युक्त आक्षेपों से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है।

मेरी दृष्टि में “वेदवाणी” में ऐसी लेखमाला जो महर्षि दयानन्द जी के वेद विषयक मन्तव्यों से विरुद्ध वेदों को ऋषियों द्वारा रचित, पौरूषेय, तथा मानवीय अनित्य इतिहास युक्त ग्रन्थ बताती हो, प्रकाशन करने योग्य नहीं है। और यदि प्रकाशित करनी ही हो तो आवश्यक सम्पादकीय टिप्पणियों के साथ करना चाहिए ताकि अनावश्यक भ्रम उत्पन्न न हो।

#Rigveda #Veda #Yajurveda

Leave a Comment

Your email address will not be published.

*
*
*

Related post