मनुस्मृति और शूद्र (भाग -1)

शूद्रों में कुछ जातियाँ अस्पृश्य समझी जाने लगीं। उनको नगर से बाहर घर दिये गए। कुओं और तालाबों पर पानी भरने और मन्दिरों आदि पवित्र स्थानों में जाने से रोका गया। उनको अच्छे उद्योग करने की भी आज्ञा न दी गई। यह यत्न किया गया कि उनकी सन्तान कभी भी उभरने न पावे। यह मनु का अभिप्राय कदापि न था।

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मनुस्मृति और शूद्र (भाग -1)
Pt. Ganga Prasad Upadhyay

पंडित गंगाप्रसाद (६ सितम्बर १८८१ - २९ अगस्त १९६८) एक आर्य समाजी लेखक और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य थे। वे हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, फारसी और संस्कृत भाषाओं के प्रकांड पंडित थे। ... Know More


  • Apr 24 2022

हम गत लेख में बता चुके हैं कि शूद्र वे हैं जिनको अयोग्यतावश या तो ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य बनने की प्रतिज्ञा का साहस नहीं हुआ या प्रयत्न करने पर आन्तरिक दुर्बलताओं के कारण वे नहीं बन सके और उनको शूद्र ही रह जाना पड़ा। जो अनुत्तीर्ण हुए परीक्षार्थियों की दशा होती है वही उनकी हुई। इसलिए शूद्रों का वर्ण-धर्म में सबसे निचला होना स्वाभाविक है। यह अन्याय या अत्याचार नहीं है और न इनका दोष स्मृतिकार के माथे है।

परन्तु वर्तमान हिन्दू जाति इन नीचे लिखी बातों में अवश्य दोषी है –

(१) वर्णों को जन्म के आधार पर मानकर वरण करने की स्वतंत्रता नहीं दी गई। इससे जन्म पर आधारित सैकड़ों जातियाँ और उपजातियाँ भारतवर्ष में उत्पन्न हो गईं। इनके गुण-कर्म वा स्वभाव कुछ भी हों, इनको अपनी पुरानी जाति के नाम से पुकारा गया।

(२) पहले वर्ण गुण-कर्म और स्वभाव के अनुसार थे और व्यक्तियों का मान भी उन्हीं के अनुकूल था। अब इन जातियों में नीच-ऊँच की कल्पित मर्यादा स्थापित हो गई – उच्च जाति के गुणहीन व्यक्तियों की भी प्रतिष्ठा हुई और नीच जाति के गुणवान् व्यक्तियों को भी नीच समझा गया।

(३) पचासों व्यवसाय करनेवाली वैश्य जातियों को शूद्र समझ लिया गया।

(४) व्यवसाय जातियों से सदैव के लिए सम्बद्ध हो गए। व्यक्तियों को नये व्यवसाय करने या सीखने की स्वतन्त्रता न दी गई।

(५) ब्राह्मणों के अतिरिक्त सबको वेद पढ़ने से रोका गया और शूद्रों को तो पढ़ाया ही नहीं गया।

(६) शूद्रों में कुछ जातियाँ अस्पृश्य समझी जाने लगीं। उनको नगर से बाहर घर दिये गए। कुओं और तालाबों पर पानी भरने और मन्दिरों आदि पवित्र स्थानों में जाने से रोका गया। उनको अच्छे उद्योग करने की भी आज्ञा न दी गई। यह यत्न किया गया कि उनकी सन्तान कभी भी उभरने न पावे। यह मनु का अभिप्राय कदापि न था। उन्होंने कहीं यह नहीं कहा कि जाति जन्मपरक है। उन्होंने तो स्पष्ट कह दिया कि

शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम्। (मनु० १०/६५)

अर्थात् शूद्र ब्राह्मण हो सकता है और ब्राह्मण शूद्र। किन्तु, शूद्र तो तभी ब्राह्मण होगा जब उसे पढ़ने-पढ़ाने की आज्ञा होगी।

यह ठीक है कि शूद्र जब तक अपढ़ और अनाड़ी है उसका मान नहीं हो सकता और न होना चाहिए। संसार भर के किसी देश या जाति में गुणहीनों के मान का प्रश्न नहीं उठता। परन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि गुणहीनों को छुआ न जाए या उनके उन्नति के मार्ग अवरुद्ध कर दिये जाएँ वा उनके साधारण भोजन-छादन का प्रबन्ध न हो।

यदि आजकल की बहुत-सी जातियों को जो कृषि, पशुपालन आदि वैश्य-कार्य करती हैं और जिनको शूद्र समझा जाता है, शूद्रों की कोटि से निकाल दिया जाए और वैश्यों की कोटि में रख दिया जाए तो केवल वही शूद्र कहलाने के योग्य रह जाएँगे जो उन्नतिशील नहीं हैं और जिनको आजकल की भाषा में कुली कहते हैं। ये कुली लोग क्या करके रोज़ी कमावें? क्योंकि समाज मुफ्त तो किसी को भी खिलाना नहीं चाहेगा। इनके लिए वही काम है जो मनु जी ने लिखा है अर्थात् –

एकमेव तु शूद्रस्य प्रभुः कर्म समादिशत्।

एतेषामेव वर्णानां शुश्रूषामनसूयया॥ (मनु० /९२)

विप्राणां वेदविदुषां गृहस्थानां यशस्विनाम्।

शुश्रूषैव तु शूद्रस्य धर्मो नैश्रेयसः परः॥ (मनु० /३३४)

अर्थात् उच्च वर्गों की सेवा करें। सेवा का अर्थ यह है कि व्यक्तियों को अपने जीवन के साधारण काम करने या उन वर्गों के विशेष काम करने में सहायता दी जाए। साधारण दैनिक काम ये हैं- झाडू लगाना, पानी खींचना, लकड़ी चीरना, या इसी प्रकार के छोटे-बड़े काम करना। वर्ण-सम्बन्धी विशेष काम हैं- ब्राह्मणों की पुस्तक आदि को संभालकर रखना या उठाकर इधर-उधर ले जाना, यज्ञ के पात्रों को शुद्धतापूर्वक माँजना, पाठशालाओं में ब्रह्मचारियों की छोटे-मोटे कार्यों में सहायता करना; क्षत्रियों के शस्त्र आदि उठाना, ले-जाना या साफ करना, उनके घोड़े आदि की रखवाली करना; वैश्यों के खेती-बाड़ी, व्यापार, कला-कौशल आदि में वे काम करना जिसमें विशेष बुद्धि की अपेक्षा नहीं है।

मानवीय विधान -ऊँची सोच

मनु इस विषय में दो शब्द कहते हैं। प्रथम श्लोक में अनसूयया’ शब्द पड़ा है अर्थात् डाह न करना चाहिए। जो भृत्य डाह करेगा वह न अपने लिए भला, न स्वामी के लिए। कल्पना कीजिए कि आप रेल से उतरते हैं और अपने बहुमूल्य वस्त्र कुली के सिर पर रख देते हैं। यदि कुली भला है तो उसे आपके बहुमूल्य वस्त्रों से क्या काम? वह तो मज़दूरी लेगा और बस। परन्तु यदि वह डाह करता है तो जी में कहेगा-‘इसके पास ऐसे उत्तम कपड़े और मेरे पास एक कुरता भी नहीं!’ इसी प्रकार यदि वह पाचक है तो स्वामी को खिलाते समय जी में कुढ़ता जाएगा कि स्वामी ऐसे माल खाता है और मेरे नसीब में क्यों नहीं? कुढ़ते-कुढ़ते यदि जी में चोरी या छल-कपट आ गया तो फिर तो नीचता का ठिकाना ही नहीं। जिन देशों में छूतछात या शूद्र आदि जातियों की प्रथा नहीं है, वहाँ भी कुली तो हैं ही। वहाँ भी तो ‘असूया’ बुरी समझी जाएगी।

दूसरे श्लोक में मनु ने उन शूद्रों के लिए उपदेश दिया है जिनमें उन्नति करने की लालसा बनी हुई है। यह लालसा उनकी तभी पूरी हो सकती है जब उच्च कोटि के ब्राह्मणों और यशस्वी गृहस्थियों के संपर्क में आवें। इससे उनकी शूद्रता में कमी होगी और शनैः-शनै: वे अपनी नीच गति से छुटकारा पाकर ऊँचा उठ सकेंगे।

मनु की दृष्टि में शूद्र का मान

भृत्यों के पालन-पोषण के विषय में मनु का नीचे का श्लोक विचारणीय है

देवतातिथिभृत्यानां पितॄणामात्मनश्च यः।

न निर्वपति पञ्चानामुच्छ्वसन्न स जीवति॥ (३/७२)

अर्थात् भृत्यों का पालन-पोषण उतना ही आवश्यक है जैसा अतिथि या माता-पिता का। भृत्यों को माता-पिता की कोटि में लाकर मनु ने गृहस्थों के भृत्यों के प्रति कर्त्तव्यों का गौरव बताया है।

यह ठीक है कि आजकल जो मनुस्मृति पाई जाती है उसमें शूद्रों को सदा नीच रखने, उनसे बचने, उनको कठोर दण्ड देने विषयक कई श्लोक हैं। जैसे –

३/१४-१७, ४/६१/४/२२३, ५/८९२, ८/११३-११४, ८/२७०, ७१, ७२, ८/२७९-८५, ८/३७४, ८/४१३-४१४, ९/१५७, १०/५१-५२, १०/६४, १०/१२९

परन्तु थोड़ा-सा भी प्रसंग, शब्द-विन्यास, परापर सम्बन्ध, विषय आदि पर विचार करने से स्पष्ट हो जाता है कि मनु महाराज के अभिप्राय के विरुद्ध इनको किसी समय मिला दिया गया है। उदाहरण के लिए, अध्याय ३ के श्लोक १६ में शौनक और भृगु की सम्मति देकर अपने कथन की पुष्टि की गई है। शौनक कौन थे और भृगु कौन और क्या वे मनु से पहले हुए, ये सब बातें मीमांसनीय हैं, क्योंकि मनुस्मृति ही भृगुसंहिता कहलाती है, क्योंकि मनु के शिष्य भृगु ने इसको श्लोकबद्ध किया है। फिर भृगु-लिखित श्लोकों में भृगु की साक्षी का कोई अर्थ नहीं है। प्रतीत होता है कि शूद्रों की नीचता सिद्ध करने के लिए शौनक और भृगु के नाम की दुहाई देने के लिए किसी ने ये श्लोक मिला दिये।

मूर्ख राजा के बारे

चौथे अध्याय का ६१वाँ श्लोक इतना बुरा नहीं है। यह नहीं कह सकते कि यह क्षेपक है या नहीं। इसमें शूद्र राजा के राज्य में बसने का निषेध है। यदि यहाँ शूद्र का अर्थ जन्मपरक शूद्र है तो अवश्य क्षेपक होगा, क्योंकि यह सिद्धान्त मनु को अभिमत नहीं है। परन्तु यदि इसका अर्थ अज्ञानी मूर्ख राजा है तो उचित ही है, क्योंकि कभी-कभी आर्य मर्यादा के शिथिल हो जाने पर क्षत्रिय राजा का शूद्रत्व को प्राप्त हुआ पुत्र भी राजा बना दिया जाता है और उसके राज्यकाल में अन्याय और अत्याचार की सम्भावना अधिक हो जाती है।

१०वें अध्याय ६४वाँ श्लोक तो यों कहना चाहिए कि धींगाधींगी से मिलाया गया है और पाठकों की आँखों में धूल डाली गई है। इसका मुख्य प्रयोजन अगले श्लोक के प्रभाव को नष्ट करना मात्र है।

परन्तु मनु के इन प्रक्षिप्त श्लोकों को देखने और उनकी पिछली अन्य स्मृतियों से तुलना करने से यह विदित होता है कि आगे चलकर शूद्रों पर भयानक बाधाएँ लगाई गई हैं। शूद्रों की वर्तमान दशा के लिए यही स्मृतियाँ उत्तर-दात्री हैं। मनुस्मृति में क्षेपकों की भरमार भी इन्हीं स्मृतिकारों या उन्हीं के सदृश विचार रखनेवालों ने की है।

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