प्रजातन्त्र अथवा वर्णाश्रम व्यवस्था – गुरुदत्त

देश की अराजकता का सम्बन्ध तो इस बात के साथ है कि सन् 1951 से लेकर सन् 1962 तक चीनियों की आक्रान्त प्रवृत्ति का ज्ञान होने पर भी, और सैनिक अधिकारियों के सचेत और सतर्क करने पर भी, भारत सरकार ने कुछ नहीं किया। करों से प्राप्त धन, अधिकारी और उनको मत देने वालों की वृद्धि में प्रयोग होता रहा।

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प्रजातन्त्र अथवा वर्णाश्रम व्यवस्था – गुरुदत्त
Gurudutt

विज्ञान के विद्यार्थी और पेशे से वैद्य होने के बावजूद गुरुदत्त (8 दिसम्बर 1894 - 8 अप्रैल 1989) बीसवीं शती के एक ऐसे सिद्धहस्त लेखक थे, जिन्होने लगभग दो सौ उपन्यास, संस्मरण, जीवनचरित, आदि का सृजन किया और भारतीय इतिहास, धर्म, दर्शन, संस्कृति, विज्ञानं, राजनीति और समाजशास्त्र के क्षेत्र में भी अनेक उल्लेखनीय शोध-कृतियाँ दीं। ... Know More


  • Apr 22 2022

चीन ने आक्रमण एकाएक नहीं कर दिया। उससे पूर्व चीन के आक्रान्त कार्य सन् 1951-52 से प्रकट हो रहे थे। चीन ने तिब्बत पर अधिकार जमा लिया था; तदुपरान्त सन् 1956 में भारत क्षेत्र में अपनी सड़क बना ली। इसके उपरान्त उस सड़क की रक्षा के लिए लद्दाख में भारत-सीमा के अन्दर कई सैनिक चौकियाँ बनायीं और अपने सैनिक भेज कर क्षेत्रों में गश्त लगवा दी। जब भारत के सैनिक अपने ही क्षेत्र की रक्षा के लिए अपने ही क्षेत्र में सैनिक चौकियाँ बना रहे थे तो उनको मार-पीट कर भगा दिया गया। भारत सरकार चीन से लिखा-पढ़ी करती रही, परन्तु सीमा-क्षेत्र को सुरक्षित करने के उपाय नहीं किये गये। देश के भीतर से सीमा तक सड़कें नहीं बन सकी और कदाचित् इनके बनाने की योजना भी नहीं थी। अब तो यह बात भी स्पष्ट हो गयी है कि सैनिक अधिकारी तब से ही चीख-पुकार कर रहे थे जब चीन ने तिब्बत पर अधिकार जमाया था, परन्तु भारत की जनता के प्रिय नेता और निरन्तर निर्वाचित होने वाले प्रधानमन्त्री सैनिकों की माँग को रद्द करते रहे और देश की सुरक्षा का प्रबन्ध नहीं किया। यह भी नहीं कि देश पर कर कम किये जा रहे थे, जिससे सुरक्षा के लिए धन न रहे। वास्तविकता यह है कि प्रति वर्ष करों में वृद्धि होती रही। राज्य की आय निरन्तर बढ़ती गयी, परन्तु जनता के प्रतिनिधि देश की सुरक्षा का प्रबन्ध नहीं कर सके। उस समय कुछ ऐसी बात भी नहीं थी कि दाम देकर विदेशों से बढ़िया शस्त्रास्त्र न मिल सकते हों। तब किसी प्रकार का प्रतिवन्ध न था, वरन् एक बार तो अमेरिका ने कुछ साधारण-सी शर्तों पर सीमाओं की रक्षा के लिए बढ़िया-से-बढ़िया शस्त्रास्त्र बिना मूल्य देने का प्रस्ताव किया था। भारत सरकार ने यह प्रस्ताव स्वीकर नहीं किया और न ही कर-वृद्धि से अपनी आय बढ़ाकर शस्त्रास्त्र मोल लिए और जब सन् 1962 में चीनियों ने आक्रमण किया तो भगदड़ मच गयी। सहस्रों सैनिक मारे गये। एक विस्तृत क्षेत्र पर चीनियों ने अधिकार कर लिया और साथ ही हिमालय की दुरूह घाटियों को पार कर चीनी भारत की ओर आ गये। एक समय तो यह स्थिति उत्पन्न हो गयी कि आसाम खाली किया जाने लगा। एकाएक चीनियों ने आक्रमण रोक दिया। बहुत-सा क्षेत्र चीनियों ने अपने अधिकार में ही रहने दिया। वह क्षेत्र जिसको ये अपने अधिकार में नहीं रख सकते थे, वापस कर दिया।
यह आक्रमण चीनियों ने स्वत: क्यों रोका और कुछ क्षेत्र को क्यों वापस कर दिया, एक पृथक विषय है। इसका देश की अराजकता के साथ सम्बन्ध नहीं है। देश की अराजकता का सम्बन्ध तो इस बात के साथ है कि सन् 1951 से लेकर सन् 1962 तक चीनियों की आक्रान्त प्रवृत्ति का ज्ञान होने पर भी, और सैनिक अधिकारियों के सचेत और सतर्क करने पर भी, भारत सरकार ने कुछ नहीं किया। करों से प्राप्त धन, अधिकारी और उनको मत देने वालों की वृद्धि में प्रयोग होता रहा।

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