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सन्ध्या से पूर्व ज्ञातव्य बातें

ऋषयो दीर्घसन्ध्यत्वात् दीर्घमायुरवाप्नुयुः।
प्रज्ञां यशश्च कीर्तिं च ब्रह्मवर्चसमेव च।। [मनु० ४.९४]

-ऋषियों ने दीर्घसन्ध्या करके लम्बी आयु, मेधा बुद्धि, यश, प्रसिद्धि और ब्रह्मतेज को प्राप्त किया है।

सन्ध्या से पूर्व ज्ञातव्य बातें

ब्रह्मयज्ञ – सन्ध्या-उपासना और स्वाध्याय का नाम ब्रह्मयज्ञ है। प्रतिदिन सन्ध्या-अग्निहोत्र करने के उपरान्त वेदादि मोक्षसाधक ग्रन्थों का स्वाध्याय करना चाहिये।
सन्ध्या का अर्थ – “सन्ध्यायन्ति सन्ध्यायते वा परब्रह्म यस्यां सा सन्ध्या” [पञ्चमहायज्ञ विधि] = भलीभांति ध्यान करते हैं, अथवा ध्यान किया जाये परमेश्वर का जिसमें, वह क्रिया सन्ध्या है।

उपासना – जिसको करके ईश्वर ही के आनन्दस्वरूप में अपने आत्मा को मग्न करना होता है; उसको उपासना कहते हैं।” [आर्योद्देश्यरत्नमाला]

सन्ध्या का प्रयोजन – हमें मानव जन्म देने वाले और सृष्टि को रचकर हमें सुख देने वाले और हमारा उपकार करने वाले परमात्मा की स्तुति-प्रार्थना-उपासना करना। उसके स्मरण से जीवन को धार्मिक, सुखी-समृद्ध, परोपकारी बनाकर आत्मोन्नति करना। इस प्रकार धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष = पुरुषार्थ चतुष्टय की सिद्धि करना।
सन्ध्या का लाभ – सुख-शान्ति, आध्यात्मिकता की प्राप्ति व प्रसार। उससे उत्तम व सुन्दर परिवार, समाज एवं राष्ट्र का निर्माण। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की सिद्धि। दीर्घसन्ध्या से दीर्घायु, यश, बुद्धि कीर्ति और ब्रह्मतेज की प्राप्ति।
सन्ध्या का काल – सायं-प्रातः दोनों सन्धि वेलाओं में दोनों समय प्रतिदिन। प्रातः ब्राह्ममुहूर्त से सूर्योदय पर्यन्त, सायंकाल सूर्यास्त से तारादर्शन तक। दोनों काल का भोजन सन्ध्या के उपरान्त ही करें। प्रातःसन्ध्या यज्ञ से पूर्व और सायंकालीन यज्ञ के उपरान्त करें।
सन्ध्या कौन करें – आबाल-वृद्ध, नर-नारी सभी को परमेश्वर की उपासना करने का अधिकार है।
सन्ध्या के वस्त्र – स्वच्छ, पवित्र एवं सादगीपूर्ण। सुविधापूर्ण एवं ऋतु-अनुकूल। सफेद वस्त्रों की परम्परा अधिक है, क्योंकि उनमें स्वच्छता, पवित्रता और सादगी रहती है। मलीनता शीघ्र दृष्टिगोचर हो जाती है।
सन्ध्या का स्थान – शुद्ध-पवित्र, शान्त-एकान्त-प्रदेश, जहां एकाग्रता हो सके। अथवा घर या नगर आदि में निर्मित उपासनालय।
सन्ध्या का आसन– स्वच्छ-पवित्र और सुखद आसन, जिस पर देर तक बिना कष्ट होकर बैठा जा सके। यह कुश, ऊन, कपास, रेशम व मृगचर्म आदि का हो सकता है।
सन्ध्या में आसन – पद्मासन या सिद्धासन में बैठे, शरीर झुका न हो, सीधा हो। दोनों आंखें बन्द रखकर मुख सामने की ओर हो। हाथों की दोनों हथेलियों या करपृष्ठ को या तो पैरों के घुटनों पर रखें अथवा हथेली पर हथेली रखकर ठीक नाभि के नीचे जमा लेना चाहिये, या दोनों घुटनों के मध्य में सामने रख लेना चाहिये।
सन्ध्या में मुखदिशा – जिधर से शुद्ध वायु आ रही हो, उधर मुख करें। किसी दिशा-विशेष का बन्धन नहीं है।
सन्ध्या का प्रकार – स्नानादि से शरीर की शद्धि करके सन्ध्या के लिए आसन ग्रहण करने के पश्चात् मन को शान्त और एकाग्र करें। इस प्रकार सन्ध्या के लिए उपयुक्त मनोभूमि बनायें, पुनः सन्ध्या आरम्भ करें। सत्य मन-वचन-कर्म से श्रद्धापूर्वक सन्ध्या के अनुष्ठानों को सम्पन्न करें।
मन्त्रों का जप या उच्चारण करते हुए अर्थ विचारपूर्वक परमेश्वर की स्तुति-प्रार्थना-उपासना ध्यान लगाकर करें। मन और आत्मा को परमात्मा के ध्यान में स्थिर करें तथा सन्ध्योक्त भावों को आचरण में लाकर जीवन को तदनुकूल बनायें।

मन्त्रार्थ विचारपूर्वक ईश्वर-स्तुति-प्रार्थना-उपासना

उपासना विधि – तत्पश्चात् गायत्री आदि मन्त्रों के अर्थों पर मन से विचार करते हुए ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना, उपासना करें। प्राणायाम भी करें और प्राणायामपूर्वक उपासना भी करें। उसकी विधि निम्न प्रकार है –
स्तुति – परमेश्वर के गुणों और उपकारों का, उसके नामों और दिव्य कर्मों का स्मरण-ध्यान करना स्तुति है।
प्रार्थना – सब उत्तम कामों में ईश्वर की सहायता की कामना करना प्रार्थना है। मनुष्य निर्बल या अल्पसामर्थ्य वाला और परमेश्वर सर्वसामर्थ्यवान् है। सामर्थ्यवान् से ही प्रार्थना होती है, अतः वही प्रार्थनीय है। महर्षि दयानन्द के शब्दों में –

“पश्चात् प्रार्थना करें, अर्थात् सब उत्तम कामों में ईश्वर का सहाय चाहें और सदा पश्चात्ताप करें कि मनुष्य शरीर धारण करके हम लोगों से जगत् का उपकार कुछ भी नहीं बनता; जैसा कि ईश्वर ने सब पदार्थों की उत्पत्ति करके जगत् का उपकार किया है, वैसे हम लोग भी सबका उपकार करें। इस काम में परमेश्वर हमको सहाय करे कि जिससे हम लोग सबको सदा सुख देते रहें।”
[पञ्चमहायज्ञ विधि सन्ध्योपासन प्रकरण]

उपासना – ईश्वर के ध्यान में और स्वरूप में अपनी आत्मा को मग्न करना उपासना है। महर्षि दयानन्द लिखते हैं- तदनन्तर ईश्वर की उपासना करें। सो दो प्रकार की है- एक, सगुण और दूसरी, निर्गुण। जैसे ईश्वर सर्वशक्तिमान्, दयालु, न्यायकारी, चेतन, व्यापक, अन्तर्यामी, सबका उत्पादक, धारण करने हारा, मंगलमय, शुद्ध, सनातन, ज्ञान और आनन्दस्वरूप है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष पदार्थों का देने वाला, सबका पिता, माता, बन्धु, मित्र, राजा, न्यायाधीश है। इत्यादि ईश्वर के गुण-विचारपूर्वक उपासना करने का नाम सगुणोपासना है।
तथा निर्गुणोपासना इस प्रकार से करनी चाहिये कि ईश्वर अनादि, अनन्त है, जिसका आदि और अन्त नहीं। अजन्मा, अमृत्यु, जिसका जन्म और मरण नहीं। निराकार, निर्विकार, जिसका आकार और जिसमें कोई विकार नहीं। जिसमें रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, शब्द, अन्याय, अधर्म, रोग, दोष, अज्ञान और मलीनता नहीं है। जिसका परिमाण, छेदन, बन्धन, इन्द्रियों से दर्शन, ग्रहण और कम्पन नहीं होता। जो ह्रस्व, दीर्घ, और शोकातुर कभी नहीं होता। जिसको भूख, प्यास, शीतोष्ण, हर्ष, और शोक कभी नहीं होते। जो उलटा काम नहीं करता, इत्यादि जो जगत् के गुणों से ईश्वर को अलग जान के ध्यान करना, वह निर्गुणोपासना कहाती है।
इस प्रकार प्राणायाम करके अर्थात् भीतर के वायु को बल से नासिका के द्वारा बाहर फेंक के, यथाशक्ति बाहर ही रोक के पुनः धीरे-धीरे भीतर ले के पुनः बल से बाहर फेंक के रोकने से मन और आत्मा को स्थिर करके, आत्मा-बीच में जो अन्तर्यामी रूप से ज्ञान और आनन्दस्वरूप व्यापक परमेश्वर है, उसमें अपने आपको मग्न करके, अत्यन्त आनन्दित होना चाहिये। जैसे, गोताखोर जल में डुबकी मार के शुद्ध हो के बाहर आता है, वैसे सब जीव लोग अपने आत्माओं को शद्ध, ज्ञान-आनन्दस्वरूप व्यापक परमेश्वर में मग्न करके नित्य शुद्ध करें।
[पञ्चमहायज्ञ विधि सन्ध्योपासन प्रकरण]


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