आप हमसे इस प्रकार से जुड़ सकते हैं -

1 हमारी पोर्टल पर अपना पंजीकरण करें -
2 वैदिकधर्म को जानने हेतु प्रस्तुत सामग्री का प्रयोग करें
3 धर्म को अपने जीवन में धारण करें।

किसी भी प्रश्न/जानकारी हेतु इस ईमेल info@manurbhav.com पर अपनी बात रखें - धन्यवाद!

सन्ध्यापूर्व तैयारी

शरीरशुद्धि और आसन ग्रहण करना
पूर्ववर्णित दिनचर्या के अनुसार स्नान आदि से शरीर की बाह्य शुद्धि करने के उपरान्त, शुद्ध-स्वच्छ वस्त्र धारण करके, उत्तम आसन पर पद्मासन या सुखासन से बैठे।

अन्तःकरण की शुद्धि
राग, द्वेष, सत्य, चिन्ता, शोक आदि भावों का त्याग करके अन्तःकरण की शुद्धि करें। मन को शान्त और एकाग्र करें, क्योंकि इनके बिना सन्ध्या में ध्यान नहीं लग सकता। महर्षि दयानन्द लिखते हैं कि “शरीर शुद्धि की अपेक्षा अन्तःकरण की शुद्धि आवश्यक एवं प्रमुख है। यही सर्वोत्तम और परमेश्वर की प्राप्ति का साधन है। जल से तो शरीर के ऊपरी अंग ही शुद्ध होते हैं, अन्तःकरण की शुद्धि के लिए तो सत्याचरण, ज्ञान, तप आदि का अनुष्ठान करना चाहिये”। महर्षि मनु ने कहा है –

अद्भिर्गात्राणि शुद्धयन्ति मनः सत्येन शुद्धयति।
विद्यातपोभ्यां भूतात्मा बुद्धिज्ञनिन शुद्धयति।।  [मनु० ५.१०९]

अर्थात् जल से केवल शरीर के अंगों की शुद्धि होती है। मन सत्याचरण से शुद्ध होता है। आत्मा विद्याभ्यास एवं योगाभ्यास से शुद्ध होती है तथा बुद्धि ज्ञान से शुद्ध होती है।

मार्जन
मन को शान्त और एकाग्र करने के उपरान्त कुशा वा हाथ से मार्जन करे = अंगों पर पानी के छींटे दे। इसका प्रयोजन यह है कि “परमेश्वर का ध्यान करते समय किसी प्रकार का आलस्य न आवे। यदि आलस्य न हो, तो न करे।” [ पञ्चमहायज्ञ विधि/सत्यार्थप्रकाश – समुल्लास ३ ]
मार्जन क्रिया करने का मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी है। इस प्रकार उपासक इस बात से सावधान रहता है कि कहीं आलस्य प्रभावी न हो जाये! सावधानी से आलस्य से बचाव रहता है।

प्राणायाम
मार्जन के पश्चात् प्राणायाम करें। प्राणायाम का प्रयोजन भी मन को एकाग्र, शान्त और सन्ध्या के लिए उपयुक्त बनाना है, जिससे सन्ध्योपासन पूर्ण निष्ठा से हो सके। महर्षि ने लिखा है- “इससे आत्मा और मन की स्थिति सम्पादन करे”। [पञ्चमहायज्ञ विधि]
प्राणायाम के कई भेद हैं। उनमें प्रथम है – अन्दर के श्वास को बलपूर्वक बाहर निकालकर यथाशक्ति रोकें, फिर धीरे-धीरे भीतर ले जायें और भीतर थोड़ा रोकें। यह एक प्राणायाम हुआ। ऐसे कम से कम तीन प्राणायाम करें और इन्द्रियों को बाह्य विषयों से खींचकर मन को एकाग्र करें।

गायत्री द्वारा शिखाबन्धन
इसके अनन्तर गायत्री मन्त्र का उच्चारण करें और तत्पश्चात् शिखाबन्धन करें। शिखाबन्धन क्रिया बाहरी रूप से शिखा को व्यवस्थित रूप से विधिवत् बांधने के लिए है और प्रतीकार्थ रूप में विचारों में बिखरे मन को संयमित करने के लिए है। गायत्री मन्त्र का उच्चारण करते हुए अर्थ विचारपूर्वक प्रार्थना भी करें। यह संकेत महर्षि के इस वाक्य से मिलता है-

“और रक्षा करने का प्रयोजन यह है कि परमेश्वर प्रार्थित होकर सब भले कामों में सदा सब जगह में हमारी रक्षा करे”। [पञ्चमहायज्ञ विधि]

अर्थ सहित गायत्री मन्त्र निम्न है-

ओ३म् भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।
धियो यो नः प्रचोदयात् ।। [यजु० अ० ३६.। मन्त्र ३]

अर्थ- (ओम्) परमात्मा सबका रक्षक है। परमात्मा का वह मुख्य नाम है, जिसके साथ सभी नाम लग जाते हैं, जिससे ईश्वर के सब नामों का बोध होता है। (भूः) सब प्राण = जीवनस्वरूप, प्राणों से भी प्रिय (भुवः) सब दुःखों से छुड़ाने वाला, (स्वः) स्वयं सुखस्वरूप है और सबको सब सुखों की प्राप्ति कराने हारा है। (तत्) उस (सवितुः) सकल जगत् के उत्पादक, प्रकाशक परम ऐश्वर्यवान् (वरेण्यम्) कामना करने योग्य, अतिश्रेष्ठ, (भर्गः) शुद्ध, विज्ञानस्वरूप और अज्ञान, दोष क्लेश आदि को भस्म करने वाले (देवस्य) दिव्यगुणों से युक्त, आनन्ददाता परमेश्वर का (धीमहि) हम ध्यान करते हैं, उसको हृदय में धारण करते हैं (यः) जो वह धारण और ध्यान किया हुआ परमेश्वर (नः धियः) हमारी धारणावती बुद्धियों को (प्रचोदयात्) उत्तम गुण, कर्म, स्वभावों में प्रेरित करे।
इस प्रकार इन क्रियाओं के द्वारा, सन्ध्योपासन के लिए मन और आत्मा में उपयुक्त दृढ़भूमि = वातावरण बनाकर आचमनपूर्वक सन्ध्योपासन के अनुष्ठान आरम्भ करें –


SIGN IN YOUR ACCOUNT TO HAVE ACCESS TO DIFFERENT FEATURES

CREATE ACCOUNT

FORGOT YOUR DETAILS?

TOP