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उपस्थान मन्त्र

विधि – आचमन के द्वारा शरीर को, इन्द्रियस्पर्श और मार्जन मन्त्रों से इन्द्रियों को, प्राणायाम से मन को, अघमर्षण मन्त्रों से बुद्धि को और मनसापरिक्रमा मन्त्रों से चित्त को शुद्ध, शान्त और स्थिर करके उपस्थान मन्त्रों के उच्चारण और अर्थ विचारपूर्वक सर्वव्यापक ईश्वर की उपासना करते हुए उपस्थान करें अर्थात् ईश्वर के समीप बैठा हुआ अनुभव करें।
उप उपसर्ग पूर्वक ‘ष्ठा-गतिनिवृत्तौ’ धातु से उपस्थान शब्द बनता है, जिसका अर्थ है उप = समीप, स्थान = बैठना। अपने चित्त को स्थिर करके परमेश्वर के समीप बैठा हुआ स्वयं को अनुभव करना। मनसापरिक्रमा मन्त्रों में मन चहुँ ओर परिक्रमण कर ईश्वर के अनन्त ऐश्वर्य, शक्ति, व्यापकता में आनन्द अनुभव कर रहा था। यहां उसे आत्मा में स्थिर करना है और स्वयं को प्रभु के आश्रय में स्थित करना है। मन्त्र निम्न हैं –

ओं उद्वयं तमसस्परि स्वः पश्यन्त उत्तरम् ।
देवं देवूत्रा सूर्यमगन्म ज्योर्तिरुत्तमम् ।।१।।
[यजु० अ० ३५ । मं० १४।।]

अर्थ- हे परमेश्वर ! (वयम्) हम सब (तमसः + परि) अज्ञानान्धकार से पृथक् रहने वाले, (स्वः) आनन्दस्वरूप और स्वयं प्रकाशस्वरूप, (उत्तरम्) प्रलय के अनन्तर भी सदा वर्तमान, (देवत्रा देवम्) देवों में भी देव = देवाधिदेव, अर्थात् आनन्द और प्रकाश देने वालों के आनन्ददाता और प्रकाशक (सूर्यम्) चराचर जगत् के संचालक, प्रेरक (उत्तमम्) सर्वोत्तम (ज्योतिः) ज्ञानस्वरूप आपको (उत् + अगन्म) उत्कृष्ट श्रद्धा से प्राप्त हुए हैं।

उदु त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः दृशे विश्वाय सूर्यम् ।।२।।
[यजु० अ० ३३ । मं० ३१ ।।]
अर्थ- () निश्चय से (केतवः) किरणें या पताकाएं अर्थात् सृष्टि के सभी पदार्थ, संचालक नियम, गुण और वेदों की ऋचाएं जो कि ईश्वर की सत्ता की बोधक हैं, या बुद्धियां (त्यम्) उस (जातवेदसम्) प्रत्येक उत्पन्न पदार्थ में विद्यमान, प्रत्येक उत्पन्न पदार्थ का वेत्ता, वेदों का रचयिता जो सर्वज्ञ परमेश्वर है, उसको और (देवम्) दिव्य गुणयुक्त देवाधिदेव (सूर्यम्) सकल जगत् के उत्पादक और प्रकाशक ईश्वर को (विश्वाय दशे) पूर्णरूप से दिखाने या ज्ञान कराने के लिए (उद्-वहन्ति) भलीभांति जनाती हैं और प्राप्त कराती हैं। हम उसको प्राप्त करते हैं।

चित्रं देवानामुर्दगानीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः ।
आप्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्ष सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च स्वाहा।।३।।
[यजु० अ० ७ । मं० ४२ ।।]

अर्थ- वह परमात्मा (चित्रम्) पूज्य, कामना करने योग्य और अद्भुत = विलक्षण स्वरूप और शक्ति से युक्त है (देवानाम् अनीकम्) दिव्यगुण स्वभाव वाले विद्वानों का परम उत्तम बल है, आश्रय है। विद्वज्जन उसी से बल प्राप्त करते हैं। (उत् + अगात्) वह अच्छी प्रकार हमारी आत्मा में प्रकाशित होवे अर्थात् प्रकाशित हुआ है। वह (मित्रस्य) रागद्वेषरहित, मित्रभावना वाले मनुष्य का = उपासक का (वरुणस्य) श्रेष्ठ आचरण के कारण जो वरणीय = प्रशंसनीय या चाहने योग्य है, ऐसे उपासक का (अग्नेः) उत्तम ज्ञान वाले उपासक का (चक्षुः) मार्गदर्शक है। वह (द्यावा-पृथिवी-अन्तरिक्षम्) द्युलोक, पृथिवीलोक, आकाश आदि लोक-लोकान्तरों को (आ + अप्राः) रचकर और उनमें व्याप्त होकर धारण कर रहा है। वह (सूर्यः) सकल जगत् का उत्पादक और प्रकाशक है, (जगतः च तस्थुषः आत्मा) चेतन और स्थावर जगत् का आत्मा है, उसमें व्याप्त होकर संचालन करने वाला है। (स्वाहा) मैं सत्य, मधुर, कोमल वाणी और हृदय से उस प्रभु का स्मरण और गुणगान करता हूँ।

तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक़मुच्चरत्। पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शत श्रृणुयाम शरदः शतं प्र ब्रवाम शरदः शतमदीनाः स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात् ।।४।।
[यजु० अ० ३६ । मं० २४ ]

अर्थ- (तत्) वह मेरा उपास्य (चक्षुः) सबका मार्गदर्शक और सबका द्रष्टा, (देवहितम्) दिव्य गुण-कर्म-स्वभाव वाले विद्वानों का हितकारी है, (शुक्रम्) शुद्ध एवं ज्ञानस्वरूप, पवित्र एवं पवित्रकर्ता है, (पुरस्तात् उच्चरत्) सम्मुख उपस्थित हुआ है, आत्मा में उसका अनुभव हुआ है। उसको (शरदः शतं पश्येम) सौ वर्ष तक हम देखें, (शरदः शतं जीवेम) उसको देखते हुए सौ वर्ष तक जीयें, (शरदः शतं श्रृणुयाम) उसको सौ वर्ष तक सुनें, (शरदः शतं प्रब्रवाम) सौ वर्ष तक उसका प्रवचन करें, (शरदः शतम् अदीनाः स्याम) उसी की उपासना से हम सौ वर्ष तक अदीन = स्वतन्त्र, स्वाभिमानी और समृद्ध बने रहें () और (शरदः शतात् भूयः) सौ वर्षों से भी अधिक समय तक हम देखें, जीयें, सुनें, प्रवचन करें और स्वतन्त्र रहें। इस प्रकार हम प्रभु की उपासना करते हुए सौ वर्ष और उससे भी अधिक वर्षों तक जीयें और समर्थ रहें।


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