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गायत्रीमन्त्र

तदनन्तर गायत्री मन्त्र के उच्चारण और अर्थ विचार पूर्वक परमात्मा की स्तुति, प्रार्थना, उपासना करें –

ओ३म् भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि ।
धियो यो नः प्रचोदयात्।।
[यजु अ० ३६ । मं० ३ ]

अर्थ- (ओम्) सबका रक्षक परमात्मा। सदा, सर्वत्र सबका रक्षक होने से ओम् यह परमात्मा का मुख्य नाम है, जिसके साथ सब नाम लग जाते हैं, जिससे ईश्वर के सब नामों का बोध होता है। (भूः) सबका प्राण = जीवनस्वरूप, प्राणों से भी प्रिय, (भुवः) सब दुःखों से छुड़ाने वाला, (स्वः) स्वयं सुखस्वरूप और सबको सब सुखों की प्राप्ति कराने वाला है। (तत्) उस (सवितुः) सकल जगत् के उत्पादक, प्रकाशक,परम ऐश्वर्यवान् (वरेण्यम्) कामना करने योग्य, अतिश्रेष्ठ (भर्गः) शुद्ध, विज्ञानस्वरूप और अज्ञान, दोष-क्लेश आदि को भस्म करने वाले (देवस्य) दिव्यगुणों से युक्त, आनन्ददाता परमेश्वर का (धीमहि) हम ध्यान करते हैं, उसको हृदय में धारण करते हैं। (यः) जो वह धारण और ध्यान किया हुआ परमेश्वर (नः धियः) हमारी धारणावती बुद्धियों को (प्रचोदयात्) उत्तम गुण, कर्म, स्वभावों में प्रेरित करें।


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