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आचमन मन्त्र

आचमन विधि – निम्न मन्त्र के उच्चारणपूर्वक, सर्वव्यापक, सुखदाता परमेश्वर का ध्यान करते हुए उससे सुख की कामना-याचना करें और उच्चारण के अनन्तर तीन बार आचमन करें।
आचमन क्रिया – आचमन करने के लिए दाहिनी हथेली में इतना जल लें, जो कण्ठ के नीचे हृदय (छाती) तक पहुँचे; न उससे कम रहे न अधिक। हथेली के मूल और मध्यभाग में ओष्ठ लगाकर उस जल का पान करें। आचमन करते समय मुंह से किसी प्रकार का शब्द न करें। तीन आचमन करने के बाद उच्छिष्ट हाथ का प्रक्षालन कर लें। आचमन का प्रयोजन कण्ठस्थ कफ और पित्त की निवृत्ति करना है। यदि जल उपलब्ध न हो तो उसके बिना ही उपासना करें।

ओं शन्नो देवीरभिष्टयऽआपो भवन्तु पीतये ।
शंयोरभिस्रवन्तु नः ।। [यजु० अ० ३६. । मं० १२]

अर्थ- (देवीः) दिव्यगुणों से युक्त, सबका प्रकाशक, सबको आनन्द देने वाला (आपः) सर्वव्यापक परमेश्वर (अभि + इष्टये) मनोवांछित लौकिक सुख-आनन्द की प्राप्ति के लिए और (पीतये) पूर्णानन्द = मोक्ष की प्राप्ति के लिए तथा पूर्ण रक्षा के लिए (नः) हम को (शम्) कल्याणकारी (भवन्तु) होवे, और (नः) हम पर (शंयोः) सुख-शान्ति की (अभि-स्रवन्तु) चारों ओर से वर्षा करे। हम परमपिता परमेश्वर से यह प्रार्थना करते हैं।


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