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अंगस्पर्श मन्त्र

अंगस्पर्श विधि – निम्न मन्त्रों के उच्चारणपूर्वक परमात्मा से शरीरांगों एवं इन्द्रियों की स्वस्थता, दृढ़ता एवं निर्दोषता के लिए प्रार्थना करते हुए मन्त्र वर्णित अंगों का जलयुक्त अंगुलियों से स्पर्श करें।
अंगस्पर्श क्रिया – अंगस्पर्श के लिए, पात्र में से बायीं हथेली में थोड़ा जल लें, फिर दाहिने हाथ की मध्यमा और अनामिका अंगुलियों को मिलाकर उस जल से स्पर्श करें, पुनः उस जल से गीली अंगुलियों से अंगों का स्पर्श करें। प्रत्येक अंग के स्पर्श से पूर्व उंगुलियों का जल से स्पर्श करायें।
मन्त्रों में जहाँ दो समान इन्द्रियों के स्पर्श का उल्लेख है, वहाँ पहले इन्द्रिय की दाहिनी ओर और फिर इन्द्रिय की बाईं ओर स्पर्श करना चाहिये।

ओं वाक् वाक्। इसका उच्चारण करते हुए पहले मुख के दायें भाग का, पश्चात् बायें भाग का स्पर्श करें।
ओं प्राणः प्राणः। इससे दाहिने और बायें नासिका भाग का।
ओं चक्षुश्चक्षुः। इससे दाहिने और बायें नेत्र का।
ओं श्रोत्रं श्रोत्रम्। इससे दाहिने और बायें कान का।
ओं नाभिः। इससे नाभि का।
ओं हृदयम्। इससे हृदय का (हृदय छाती के वाम भाग में स्थित है)
ओं कण्ठः। इससे कण्ठ का।
ओं शिरः। इससे सिर (मस्तक) का।
ओं बाहुभ्यां यशोबलम्। इससे दाहिनी और बायीं भुजा का।
ओं करतलकरपृष्ठे। इससे दोनों हथेलियों और उनके पृष्ठभाग का स्पर्श करें।

अर्थ- (ओम्) हे ईश्वर ! मेरी (वाक्) वाग् इन्द्रिय = वाणी, और (वाक्) रसना इन्द्रिय, पूर्ण आयु पर्यन्त स्वस्थ, बलवती एवं निर्दोष बनी रहें।
(ओम्) हे ईश्वर ! मेरी (प्राणः) प्राण शक्ति, जो कि प्राण, अपान, व्यान, समान, उदान, नाग, कूर्म, देवदत्त, कृकल, धनंजय नामक दश प्राणों के रूप में समस्त शरीर में व्याप्त होकर जीवन को चला रही है, वह और (प्राणः) घ्राणेन्द्रिय, पूर्ण आयु पर्यन्त स्वस्थ, बलवती एवं निर्दोष बनी रहे।
(ओम्) हे ईश्वर ! मेरे (चक्षुश्चक्षुः) दायें और बायें दोनों नेत्र स्वस्थ, बलवान् एवं निर्दोष बने रहें।
(ओम्) हे ईश्वर ! मेरे (श्रोत्रम् श्रोत्रम्) दायें और बायें दोनों कान पूर्ण आयु पर्यन्त स्वस्थ, बलवान् एवं निर्दोष बने रहें।
(ओम्) हे ईश्वर ! मेरी (नाभिः) शरीर और नस-नाड़ियों का केन्द्र स्थान नाभि पूर्ण आयु पर्यन्त स्वस्थ, बलवती, एवं निर्दोष बनी रहे।
(ओम्) हे ईश्वर ! मेरा (हृदयम्) रक्त संचालक अंग हृदय पूर्ण आयु पर्यन्त स्वस्थ, बलवान् एवं निर्दोष बना रहे और मेरा हृदय = आत्मा बलवान् एवं निर्दोष बना रहे।
(ओम्) हे ईश्वर ! (कण्ठः) मेरा कण्ठ पूर्ण आयु पर्यन्त स्वस्थ, बलवान् एवं दोषरहित बना रहे।
(ओम्) हे ईश्वर ! मेरा (शिरः) मस्तिष्क एवं उसका निवास स्थान पूर्ण आयु पर्यन्त स्वस्थ, बलवान् एवं निर्दोष बना रहे।
(ओम्) हे ईश्वर ! मैं (बाहुभ्याम्) दोनों भुजाओं से (यशः-बलम्) यश और बल प्राप्त करूँ अर्थात् दोनों भुजाएं पूर्ण आयु पर्यन्त स्वस्थ, बलवती एवं निर्दोष बनी रहें, जिनसे मुझे यश और बल की प्राप्ति होती रहे।
(ओम्) हे ईश्वर! मेरे (करतलकरपृष्ठे) हाथ के तल और हाथ के पृष्ठभाग पूर्ण आयु पर्यन्त स्वस्थ, बलवान् एवं निर्दोष बने रहें, जिनसे मझे यश और बल प्राप्त होता रहे।


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