आप हमसे इस प्रकार से जुड़ सकते हैं -

1 हमारी पोर्टल पर अपना पंजीकरण करें -
2 वैदिकधर्म को जानने हेतु प्रस्तुत सामग्री का प्रयोग करें
3 धर्म को अपने जीवन में धारण करें।

किसी भी प्रश्न/जानकारी हेतु इस ईमेल info@manurbhav.com पर अपनी बात रखें - धन्यवाद!

मार्जन मन्त्र

मार्जन विधि – निम्न मन्त्रों के उच्चारणपूर्वक ईश्वर से शरीरांगों की स्वस्थता, बलवत्ता और निर्दोषता की प्रार्थना करते हुए उंगुलियों से उन अंगों पर जल का मार्जन करें = जल छिड़कें = छींटे दें।
मार्जन क्रिया – मार्जन के लिए, पात्र में से बायें हाथ की हथेली में थोड़ा जल लें, फिर दायें हाथ की मध्यमा और अनामिका अंगुलियों को मिलाकर उनके अग्रभाग को उस जल से स्पर्श कराके, दायें हाथ के अंगूठे की सहायता से अंगों पर मार्जन करें = जल के छीटें दें।

ओं भूः पुनातु शिरसि। इसके उच्चारणपूर्वक शिर पर मार्जन करें।
ओं भुवः पुनातु नेत्रयोः। इससे पहले दायें, फिर बायें नेत्र पर।
ओं स्वः पुनातु कण्ठे। इससे कण्ठ पर।
ओं महः पुनातु हृदये। इससे हृदय पर।
ओं जनः पुनातु नाभ्याम्। इससे नाभि पर।
ओं तपः पुनातु पादयोः। इससे पहले दायें, फिर बायें पैर पर।
ओं सत्यं पुनातु पुनश्शिरसि। इससे पुनः शिर पर।
ओं खं ब्रह्म पुनातु सर्वत्र। इससे सारे शरीर पर।

अर्थ- (ओम् भूः) सदा-सर्वदा वर्तमान रहने वाला प्राण-रूप प्रभु (शिरसि पनातु) मेरे शिर में पवित्रता करे अर्थात शिर में स्थित बद्धि को पवित्र रखे। उससे मैं पवित्र चिन्तन एवं निर्णय करूँ।
(ओम् भुवः) सबका आश्रयस्थान और सबके दुःखों को दूर करने वाला ईश्वर (नेत्रयोः पुनातु) मेरे दोनों नेत्रों में पवित्रता करे अर्थात् मेरी दृष्टि को पवित्र रखे।
(ओम् स्वः) आनन्दस्वरूप और सबको आनन्द देने वाला परमात्मा (कण्ठे) मेरे कण्ठ में (पुनातु) पवित्रता करे अर्थात् मैं सत्य और पवित्र भाषण करूं।
(ओम् महः) सबसे महान् और सबसे अधिक पूज्य परमात्मा (हृदये पुनातु) मेरे हृदय में पवित्रता करे अर्थात् मेरा हृदय और मेरी आत्मा पवित्र एवं उदार बनें, महान् बनें।
(ओम् जनः) सबका उत्पादक परमात्मा (नाभ्याम् पुनातु) मेरी नाभि में पवित्रता करे अर्थात् मेरे जनन-संस्थान में पवित्रता बनी रहे।
(ओम् तपः) तपस्वरूप, दुष्टों को सन्तप्त एवं दोषों का विनाशक परमात्मा (पादयोः पुनातु) मेरे दोनों पैरों में पवित्रता करे अर्थात् मेरा चाल-चलन = आचरण पवित्र रहे।
(ओम सत्यम्) सत्यस्वरूप और सत्याचरणप्रेरक अविनाशी परमात्मा (पुनः) फिर = बार-बार (शिरसि पुनातु) मेरे शिर = बुद्धि में पवित्रता करे अर्थात् मेरी बुद्धि को विशेष रूप से और सदैव पवित्र रखे, क्योंकि बुद्धि की पवित्रता से सभी इन्द्रियों की पवित्रता बनी रहती है।
(ओम् खं ब्रह्म) सर्वव्यापक, सर्वाधिक शक्तिशाली परमात्मा (सर्वत्र पुनातु) मेरे सम्पूर्ण शरीर को या सब अंग-प्रत्यंगों में पवित्रता करे, उनमें पवित्रता बनाये रखे।।


SIGN IN YOUR ACCOUNT TO HAVE ACCESS TO DIFFERENT FEATURES

CREATE ACCOUNT

FORGOT YOUR DETAILS?

TOP