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अघमर्षण मन्त्र

निम्न मन्त्रों के उच्चारणपूर्वक परमेश्वर को सृष्टिकर्ता, सृष्टिनियन्ता, सृष्टिहर्ता, सर्वव्यापक, न्यायकारी, सर्वत्र-सर्वदा सब जीवों के कर्मों का द्रष्टा मानकर, उसके इस स्वरूप का चिन्तन करते हुए पाप की ओर से अपने मन और आत्मा को हटायें तथा उधर न जाने दें। इनका चिन्तन करते हुए रात्रि-अवधि में किये गये अधों = पापों या दोषों का प्रातःकाल, तथा दिन में किये अधों का सायंकाल मर्षण = दरीकरण करें –

ओ३म् ऋतं च सत्यं चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत ।
ततो रायजायत ततः समुद्रो अर्णवः।।
[ऋ० १०.१९०.१]

अर्थ- परमात्मा के (अभि + इद्धात्) सब ओर प्रदीप्त ज्ञानमय (तपसः) अनन्त सामर्थ्य से (ऋतम्) सबके द्वारा प्राप्त करने योग्य यथार्थ = सत्यज्ञान अर्थात् ऋक्, यजु, साम और अथर्ववेद के रूप में प्राप्त ज्ञान का भण्डार () और (सत्यम्) सत्-रज-तम रूप प्रकृति और उसका कार्यरूप समस्त चर-अचर जगत् (अधि + अजायत) पूर्वकल्प के समान उत्पन्न हुआ। (ततः) उसी ईश्वर के सामर्थ्य से (रात्री) महाप्रलयरूप रात्रि (अजायत) उत्पन्न हुई (ततः) उसके पश्चात् । (समुद्र + अर्णवः) अन्तरिक्ष और पृथिवीस्थ समुद्र उत्पन्न हुआ अर्थात् अन्तरिक्ष से लेकर पृथिवी तक विद्यमान समस्त स्थूल पदार्थ बने।

समुद्रादर्णवादधि संवत्सरो अजायत ।
अहोरात्राणि विदधद्विश्वस्य मिष्तो वशी।।
[ऋ० १०.१९०.२]

अर्थ- (समुद्रात् + अर्णवात् + अधि) अन्तरिक्ष से लेकर पृथिवीस्थ समस्त पदार्थों के पश्चात् (संवत्सरः) क्षण, मुहूर्त, प्रहर, मास, वर्ष आदि काल (अजायत) उत्पन्न हुआ। तत्पश्चात् (विश्वस्य वशी) संसार को वश में रखने वाले उस परमात्मा ने (मिषतः) सहज रूप से (अहः-रात्राणि) दिन और रात्रि के विभागों को (विदधत्) बनाया।

सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत् ।
दिवे च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्वः।।
[ऋ० १०।१९०। ३]

अर्थ-(धाता) जगत् को उत्पन्न कर धारण, पोषण, नियमन करने वाले परमात्मा ने (सूर्य-चन्द्रमसौ) सूर्य, चन्द्रमा आदि ग्रहों-उपग्रहों को () और (दिवम्) द्युलोक (पृथिवीम्) पृथिवी लोक () और (अन्तरिक्षम्) अन्तरिक्ष आदि लोकों को (अथ स्वः) तथा ब्रह्माण्ड में जितने अन्य लोक-लोकान्तर, ग्रह-उपग्रह, आदि हैं, उनको (यथापूर्वम्) जैसे पूर्व सृष्टि में थे वैसे ही इस सृष्टि में (अकल्पयत्) बनाया।
इस प्रकार समस्त जगत् को रचकर वह परमेश्वर सबके पाप-पुण्यों का निरीक्षण करता है और उन्हें कर्मानुसार फल प्रदान करता है।


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