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मनसा-परिक्रमा मन्त्र

उद्देश्य – इन मन्त्रों में, आलंकारिक वर्णन द्वारा, संसार में प्रचलित व्यवहार के दृष्टिकोण से परमेश्वर के सर्वव्यापक , सर्वशक्तिमान् और न्यायकारी आदि स्वरूप का वर्णन किया गया है। सभी दिशाओं का परिगणन परमेश्वर के सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान होने का बोध कराने के लिए है। द्वेषभाव वाले व्यक्ति को परमात्मा के मुख में रखने का वर्णन उसके न्यायकारी और कर्मानुसार फल प्रदान करने के गुण का बोध कराने के लिए है। मनसा-परिक्रमा का अर्थ है – मन के द्वारा सर्वत्र परिक्रमण = विचरण करना और प्रभु को सर्वत्र व्यापक जानना।
विधि – इन मन्त्रों के उच्चारणपूर्वक सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान् न्यायकारी, कर्मानिसार फलदाता प्रभ का ध्यान करते हए उसकी अग्नि, इन्द्र, वरुण आदि नामों से स्तुति करें और द्वेषभाव का त्याग करके अहिंसा की सिद्धि करें। परमात्मा को बाहर-भीतर सर्वत्र जानकर निर्भय, निःशंक, उत्साही, आनन्दित और पुरुषार्थी बने रहें। इस प्रकार मन को शुद्ध बनायें।

ओं प्राची दिग्निरधिपतिरसितो रक्षितादित्या इषवः ।
तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नम रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु यो३स्मान्द्वेष्टि यं वूयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः ।।१।।

अर्थ- (प्राची दिक) जिस ओर मुख करके उपासक उपासना कर रहा है, वह प्राची दिशा है, अथवा सूर्योदय की दिशा प्राची दिशा है, (अग्निः + अधिपतिः) अग्नि = प्रकाशस्वरूप, ज्ञानस्वरूप परमात्मा ही इसका स्वामी है। (असितः + रक्षिता) बन्धनरहित और अज्ञानजन्य बन्धनों से रहित वह परमात्मा सब प्रकार से हमारी रक्षा करने वाला है। (आदित्याः + इषवः) सूर्य-किरणे अथवा ज्ञान की किरणें बाणतुल्य हैं, जो अज्ञानान्धकार की नाशक हैं और हमारी रक्षा की साधन हैं। (तेभ्यः + नमः) ईश्वर के इन सब गुणों को हम नमस्कार करते हैं। (अधिपतिभ्यः + नमः) ईश्वर के स्वामित्वपरक गुणों को हम नमस्कार करते हैं। (रक्षितृभ्यः + नमः) ईश्वर के रक्षक गुणों को हम नमस्कार करते हैं। (एभ्यः इषुभ्यः + नमः अस्तु) श्रेष्ठों की रक्षा और पापियों के पीड़ा-साधक बाणतुल्य जो उपाय हैं, हम उनको नमस्कार करते हैं। (यः + अस्मान् द्वेष्टि) जो कोई हमसे द्वेष करता है, और (वयं यं द्विष्मः) हम जिसे द्वेष करते हैं, द्वेषभाव रखते हैं (तम्) उस व्यक्ति या द्वेषभाव को (वः + जम्भे दध्मः) आपके जम्भ = मुख अर्थात् न्यायव्यवस्था में रखते हैं। अभिप्राय यह है कि जो भी कोई व्यक्ति, चाहे वह कोई अन्य है। अथवा मैं हूँ, उसको द्वेष भाव का फल देने हेतु आपको सौंपते हैं, आप ही कर्मानुसार फल दें। हम द्वेषभाव के वशीभूत होकर बदले की कोई क्रिया मानसिक, वाचिक या शारीरिक रूप से नहीं करेंगे।

दक्षिण दिगिन्द्रोऽधिपतिस्तिरश्चिराजी रक्षिता पितर इषवः। तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु। यो३स्मान्द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः।।२।।

अर्थ- (दक्षिणा दिक्) जो हमारे दाहिनी ओर है अथवा जो दक्षिण दिशा है, (इन्द्रः + अधिपतिः) पूर्ण ऐश्वर्ययुक्त परमेश्वर ही उसका स्वामी है। (तिरश्चिराजिः + रक्षिता) तिर्यक्योनि के प्राणियों अर्थात् कीट-पतंग, सर्प, वृश्चिक आदि की राजि = पंक्ति से रक्षा करने वाला वह परमेश्वर है अर्थात् तिर्यक्योनि की श्रृंखला के प्राणियों की योनि में जाने से वही या उसकी भक्ति ही रक्षा करती है। (पितरः + इषवः) पितर = ज्ञानी लोग बाणतुल्य हैं, जो ज्ञान द्वारा कुटिलतायुक्त कर्मों से हमें दूर रखते हैं और उत्तम कर्मों को ग्रहण कराते हैं। (तेभ्यः + नमः) ईश्वर के इन सब गुणों को हम नमस्कार करते हैं। (अधिपतिभ्यः + नमः) ईश्वर के स्वामित्वपरक गुणों को हम नमस्कार करते हैं। (रक्षितृभ्यः + नमः) ईश्वर के रक्षक गुणों को हम नमस्कार करते हैं। (एभ्यः इषुभ्यः + नमः अस्तु) श्रेष्ठों की रक्षा और पापियों के पीड़ा-साधक बाणतुल्य जो उपाय हैं, हम उनको नमस्कार करते हैं। (यः + अस्मान् द्वेष्टि) जो कोई हमसे द्वेष करता है, और (वयं यं द्विष्मः) हम जिसे द्वेष करते हैं, द्वेषभाव रखते हैं (तम्) उस व्यक्ति या द्वेषभाव को (वः + जम्भे दध्मः) आपके जम्भ = मुख अर्थात् न्यायव्यवस्था में रखते हैं। अभिप्राय यह है कि जो भी कोई व्यक्ति, चाहे वह कोई अन्य है। अथवा मैं हूँ, उसको द्वेष भाव का फल देने हेतु आपको सौंपते हैं, आप ही कर्मानुसार फल दें। हम द्वेषभाव के वशीभूत होकर बदले की कोई क्रिया मानसिक, वाचिक या शारीरिक रूप से नहीं करेंगे।

प्रतीची दिग्वरुणोऽधिपतिः पृदाकू रक्षितान्नमिषवः।
तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु। यो३स्मान्द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः ।।३।।

अर्थ- (प्रतीची दिक्) जो पृष्ठभाग में है अथवा जो पश्चिम दिशा है, (वरुणः + अधिपतिः) सबसे उत्तम, सबके द्वारा वरणीय और सबसे महान् ईश्वर ही उसका स्वामी है। (पदाकूः + रक्षिता) विषधर या भयंकर ध्वनि करने वाले प्राणियों से या ऐसी भावनाओं से रक्षा करने वाला है अर्थात् इनकी योनियों में जाने से बचाने वाला है (अन्नम् + इषवः) भोज्य-पेय आदि प्राणदायक पदार्थ एवं ओषधियां बाणतुल्य हैं, जो हमारे जीवन की रक्षा करती हैं और रोगों का नाश करती हैं। (तेभ्यः + नमः) ईश्वर के इन सब गुणों को हम नमस्कार करते हैं। (अधिपतिभ्यः + नमः) ईश्वर के स्वामित्वपरक गुणों को हम नमस्कार करते हैं। (रक्षितृभ्यः + नमः) ईश्वर के रक्षक गुणों को हम नमस्कार करते हैं। (एभ्यः इषुभ्यः + नमः अस्तु) श्रेष्ठों की रक्षा और पापियों के पीड़ा-साधक बाणतुल्य जो उपाय हैं, हम उनको नमस्कार करते हैं। (यः + अस्मान् द्वेष्टि) जो कोई हमसे द्वेष करता है, और (वयं यं द्विष्मः) हम जिसे द्वेष करते हैं, द्वेषभाव रखते हैं (तम्) उस व्यक्ति या द्वेषभाव को (वः + जम्भे दध्मः) आपके जम्भ = मुख अर्थात् न्यायव्यवस्था में रखते हैं। अभिप्राय यह है कि जो भी कोई व्यक्ति, चाहे वह कोई अन्य है। अथवा मैं हूँ, उसको द्वेष भाव का फल देने हेतु आपको सौंपते हैं, आप ही कर्मानुसार फल दें। हम द्वेषभाव के वशीभूत होकर बदले की कोई क्रिया मानसिक, वाचिक या शारीरिक रूप से नहीं करेंगे।

उदीची दिक्सोमोऽधिपतिः स्वजो रक्षिताशनिरिषवः ।
तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु । यो३स्मान्द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः ।।४।।

अर्थ- (उदीची दिक्) जो हमारे बाईं ओर की दिशा है, अथवा जो उत्तर दिशा है, (सोमः + अधिपतिः) शान्ति, आनन्द आदि गुणों से युक्त और आनन्दप्रद परमात्मा ही उसका स्वामी है। (स्वजः + रक्षिता) वह अजन्मा ईश्वर सबका रक्षक है। (अशनिः + इषवः) विद्युत् जिसके बाणतुल्य हैं अर्थात् उसकी सर्वत्र व्याप्त शक्तियां श्रेष्ठों को सुख-आनन्द देकर रक्षा करती हैं और दुष्टों का विनाश करती हैं। (तेभ्यः + नमः) ईश्वर के इन सब गुणों को हम नमस्कार करते हैं। (अधिपतिभ्यः + नमः) ईश्वर के स्वामित्वपरक गुणों को हम नमस्कार करते हैं। (रक्षितृभ्यः + नमः) ईश्वर के रक्षक गुणों को हम नमस्कार करते हैं। (एभ्यः इषुभ्यः + नमः अस्तु) श्रेष्ठों की रक्षा और पापियों के पीड़ा-साधक बाणतुल्य जो उपाय हैं, हम उनको नमस्कार करते हैं। (यः + अस्मान् द्वेष्टि) जो कोई हमसे द्वेष करता है, और (वयं यं द्विष्मः) हम जिसे द्वेष करते हैं, द्वेषभाव रखते हैं (तम्) उस व्यक्ति या द्वेषभाव को (वः + जम्भे दध्मः) आपके जम्भ = मुख अर्थात् न्यायव्यवस्था में रखते हैं। अभिप्राय यह है कि जो भी कोई व्यक्ति, चाहे वह कोई अन्य है। अथवा मैं हूँ, उसको द्वेष भाव का फल देने हेतु आपको सौंपते हैं, आप ही कर्मानुसार फल दें। हम द्वेषभाव के वशीभूत होकर बदले की कोई क्रिया मानसिक, वाचिक या शारीरिक रूप से नहीं करेंगे।

ध्रुवा दिग्विष्णुरधिपतिः कल्माषग्रीवो रक्षिता वीरुधू इषवः।
तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु। यो३स्मान्द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः ।।५।।

अर्थ- (ध्रुवा दिक्) जो अपने नीचे की ओर ध्रुवा नामक दिशा है, (विष्णुः + अधिपतिः) सर्वत्र व्याप्त परमेश्वर ही उसका स्वामी है। (कल्माषग्रीवः + रक्षिता) हरित रंग वाले वृक्ष आदि जिसकी ग्रीवा के समान हैं, वह वृक्ष-वनस्पति आदि का उत्पादक परमेश्वर ही हमारा रक्षक है, अथवा पापों, दोषों बुराइयों को निगलने वाला, नष्ट या दूर करने वाला ईश्वर ही कल्माषग्रीव है, वही हमारा रक्षक है। (वीरुधः + इषवः) वृक्ष-वनस्पतियां, ओषधियां आदि जिसके बाणतुल्य हैं अर्थात् जीवनदायक और रक्षक हैं; दुर्बलता, रोग आदिनाशक हैं। (तेभ्यः + नमः) ईश्वर के इन सब गुणों को हम नमस्कार करते हैं। (अधिपतिभ्यः + नमः) ईश्वर के स्वामित्वपरक गुणों को हम नमस्कार करते हैं। (रक्षितृभ्यः + नमः) ईश्वर के रक्षक गुणों को हम नमस्कार करते हैं। (एभ्यः इषुभ्यः + नमः अस्तु) श्रेष्ठों की रक्षा और पापियों के पीड़ा-साधक बाणतुल्य जो उपाय हैं, हम उनको नमस्कार करते हैं। (यः + अस्मान् द्वेष्टि) जो कोई हमसे द्वेष करता है, और (वयं यं द्विष्मः) हम जिसे द्वेष करते हैं, द्वेषभाव रखते हैं (तम्) उस व्यक्ति या द्वेषभाव को (वः + जम्भे दध्मः) आपके जम्भ = मुख अर्थात् न्यायव्यवस्था में रखते हैं। अभिप्राय यह है कि जो भी कोई व्यक्ति, चाहे वह कोई अन्य है। अथवा मैं हूँ, उसको द्वेष भाव का फल देने हेतु आपको सौंपते हैं, आप ही कर्मानुसार फल दें। हम द्वेषभाव के वशीभूत होकर बदले की कोई क्रिया मानसिक, वाचिक या शारीरिक रूप से नहीं करेंगे।

उर्ध्वा दिग्बृहस्पतिधिपतिः श्वित्रो रक्षिता वर्षमिषवः ।
तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु। यो३स्मान्द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः ।।६।।
[अथर्व० कां० ६ । सू० २७ । मं० १-६]

अर्थ- (उर्ध्वा दिक्) जो अपने ऊपर की दिशा है वह उर्ध्वा नामक दिशा है, (बृहस्पतिः+ अधिपतिः) वाणी, वेदशास्त्र और इस बृहत् ब्रह्माण्ड का पालक परमेवर ही उसका स्वामी है। (श्वित्रः + रक्षिता) वही ज्ञानमय, मेघस्वरूप परमात्मा हमारा रक्षक है। (वर्षम् + इषवः) वर्षाएं जिसके बाणतुल्य हैं अर्थात् ज्ञानवर्षा, आनन्दवर्षा, ज्ञान व सुख की साधक और अज्ञान और दुःख की नाशक है। (तेभ्यः + नमः) ईश्वर के इन सब गुणों को हम नमस्कार करते हैं। (अधिपतिभ्यः + नमः) ईश्वर के स्वामित्वपरक गुणों को हम नमस्कार करते हैं। (रक्षितृभ्यः + नमः) ईश्वर के रक्षक गुणों को हम नमस्कार करते हैं। (एभ्यः इषुभ्यः + नमः अस्तु) श्रेष्ठों की रक्षा और पापियों के पीड़ा-साधक बाणतुल्य जो उपाय हैं, हम उनको नमस्कार करते हैं। (यः + अस्मान् द्वेष्टि) जो कोई हमसे द्वेष करता है, और (वयं यं द्विष्मः) हम जिसे द्वेष करते हैं, द्वेषभाव रखते हैं (तम्) उस व्यक्ति या द्वेषभाव को (वः + जम्भे दध्मः) आपके जम्भ = मुख अर्थात् न्यायव्यवस्था में रखते हैं। अभिप्राय यह है कि जो भी कोई व्यक्ति, चाहे वह कोई अन्य है। अथवा मैं हूँ, उसको द्वेष भाव का फल देने हेतु आपको सौंपते हैं, आप ही कर्मानुसार फल दें। हम द्वेषभाव के वशीभूत होकर बदले की कोई क्रिया मानसिक, वाचिक या शारीरिक रूप से नहीं करेंगे।


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