श्री शंकराचार्य तथा श्री स्वामी दयानन्द

श्री शंकर स्वामी के उच्च ग्रन्थों तथा उनके अनुयायियों के इतिहास से कहीं यह नहीं झलकता कि उनके समक्ष ‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम्' जैसी कोई भावना रही हो। उन्होंने भारतीय सम्प्रदायों के विरुद्ध लोहा लिया।

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श्री शंकराचार्य तथा श्री स्वामी दयानन्द
Pt. Ganga Prasad Upadhyay

पंडित गंगाप्रसाद (६ सितम्बर १८८१ - २९ अगस्त १९६८) एक आर्य समाजी लेखक और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य थे। वे हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, फारसी और संस्कृत भाषाओं के प्रकांड पंडित थे। ... Know More


  • Apr 22 2022

एक प्रमुख नेता लिखते हैं –
‘आर्यसमाज को मैं विशाल हिन्दू समाज से सर्वथा पृथक् एनटिटी नहीं मानता। जिस प्रकार जगद् गुरु शंकराचार्य अपने ज़माने में वेद के उद्धारक हुए। उसी प्रकार अपनी परिस्थिति और ज़माने में ऋषि दयानन्द भी वेद के उद्धारक हुए, ऐसा मैं मानता हूं। वेद के मानने वालों के कई सम्प्रदाय हैं यह स्पष्ट है। वेदों के अर्थ में भिन्नता होना और दृष्टिकोण में अन्तर होना स्वाभाविक है, स्वयम् आर्यसमाज में दयानन्द के अनुयायी होते हुए भी दो दृष्टिकोण वाले समुदाय रहे, यह आप भली प्रकार जानते हैं। अत: जहां मैं आर्यसमाज को ‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम्’ के रूप में मानकर आप की भावनाओं का आदर करता हूं वहां आर्यसमाज को विशाल हिन्दू समाज के बाह्य अनैतिक आक्रमण के रक्षक के रूप में भी मानता हूं। इन दोनों रूपों के समन्वय को मैं असम्भव नहीं मानता और यदि हम सावधानता और बुद्धिमत्ता से काम लें तो ऐसा समन्वय हो सकता है और होता भी रहा है। और ऐसे समन्वय रूप आचरण करने में जिस बदनामी की आप आशंका करते हैं उससे आर्यसमाज बचा रह सकता है। मैं यह मानता हूं कि उस समन्वय में हम पूर्णरूपेण सफल नहीं हुए।’

जिस प्रसंग में ऊपर की पंक्तियां लिखी गई हैं उसके विषय में मुझे यहां कुछ नहीं कहना परन्तु आनुषमिकरूपेण श्री शंकराचार्य और स्वामी दयानन्द की बात आ गई। दोनों व्यक्ति इतने महान् थे कि उनकी तुलना सर्वसाधारण को करनी नहीं चाहिए। इन दोनों महानुभावों की शिक्षाओं तथा भावनाओं में बहुत बड़ा सादृश्य है परन्तु उन दोनों के दृष्टिकोणों में मुझे मौलिक भेद दिखाई देता है। आर्यसमाजियों के लिए इस भेद की उपेक्षा करना आर्यसमाज के भावी कल्याण में बाध क होगा। अतः इस का कुछ परीक्षण होना चाहिए।

श्री शंकराचार्य ने किस परिस्थिति में कार्य किया और भारत तथा बाह्य संसार के पारस्परिक सम्बन्ध क्या थे यह जानना कठिन है ? परन्तु एक बात स्पष्ट है, श्री शंकर स्वामी के उच्च ग्रन्थों तथा उनके अनुयायियों के इतिहास से कहीं यह नहीं झलकता कि उनके समक्ष ‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम्’ जैसी कोई भावना रही हो। उन्होंने भारतीय सम्प्रदायों के विरुद्ध लोहा लिया। उनका खण्डन किया और अपना एक अलग सम्प्रदाय स्थापित किया जिसका पीछे से रामानुजाचार्य आदि के सम्प्रदायों से झगड़ा होता रहा परन्तु रही यह विशाल हिन्दू समाज की घरेलू लड़ाई। श्री शंकर स्वामी के उद्योग से बौद्ध धर्म भारत से निकल भागा परन्तु वह संसार भर में फैल गया।

शांकर-सम्प्रदाय के प्रचारक चूल्हे पर ही तलवार चलाते रहे और अन्त में विशाल हिन्दू महासागर में विलीन हो गये, शांकर-दर्शन उच्चकोटि का दार्शनिक सम्प्रदाय होते हुए भी व्यवहार दशा में विशाल हिन्दू धर्म की सामान्य भावनाओं से कभी ऊपर नहीं उठा। ब्राह्मणों और शूद्रों का भेदभाव शांकर ग्रन्थों में ज्यों का त्यों है। हिन्दुओं की वे सब दुर्बलताएं जो प्रायः शिक्षित और समुन्नत जगत् में भारत और हिन्दू जाति के लिए हानिप्रद समझी जाती हैं शंकर स्वामी के व्यवहार-क्षेत्र में उतनी ही मानान्वित हैं। शंकर माया में पुराणों, देवी-देवताओं, छूतछात, जादूगरी आदि आदि सभी भ्रान्तियों के लिए स्थान मिला। इसीलिए ‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम्’ के सिद्धान्त या आकांक्षाओं का शंकरमत में दूरस्थ सम्बन्ध भी नहीं पाया जाता। ऐसा लगता है मानो शंकर-अद्वैतवाद की सूक्ष्म विचारधारा केवल गिनेचुने मुमुक्षुओं के लिए थी। शेष अविद्या-जन्य संसार में तो सभी कुछ विहित था। त्रैगुण्य संसार में ‘त्रैगुण्य-विषयाः वेदाः’ से ऊपर उठने का प्रश्न ही नहीं था। अत: कैसे सम्भव था कि शंकर मत के प्रचारक अन्य देशों में जाकर मनु के ‘एतद्देश-प्रसूतस्य’ श्लोक को चरितार्थ करने का यत्न कर सकते। आर्यसमाज में भिन्न भिन्न प्रवृत्ति वाले लोगों का होना स्वाभाविक तो है ही, और आजकल भी कई दृष्टिकोण विद्यमान हैं, ‘विचित्ररूपाः खलु चित्तवृत्तयः।‘ परन्तु देखना यह है कि ‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम्’ की भावना को प्रमुखता दी जाये और अन्य भावनाएं उसकी अनुगामिनी रहें अथवा हो जायें तो क्या बुरा है’ इस नीति को बर्ता जावे। आर्यसमाज को आप ‘विशाल हिन्दू जाति’ का अंग कहें या समस्त विशाल मानव जाति का। क्या इन दो भावनाओं के समन्वय को आवश्यक समझकर काम करें या शांकर मतवादियों के समान हिन्दुओं का एक सम्प्रदाय बन जाये, बहुत से साधारण हिन्दुओं ने तो शंकर स्वामी को शंकर का अवतार मान लिया। और उनके दर्शन की जटिलताओं से शंकर-पूजा करके ही छुट्टी ले ली। कुछ लोग तो स्वामी दयानन्द को भी ईश्वरावतार मानने के लिए उद्यत हैं परन्तु इस से क्या स्वामी दयानन्द की भावनाओं की सार्थकता सिद्ध होगी।

यदि दो भावनाएं हों। एक उच्च और दूसरी निचली। एक उदार-दृष्टि वाली और दूसरी संकुचित दृष्टि वाली तो इनका समन्वय कठिन होता है। निचली भावनाएं तो स्वभावतः जनसाध रण को जल्दी अपील करती हैं परन्तु यदि ऊपरी केन्द्रों से अधिक बल दिया जाये तो उनका दबा रहना कुछ सम्भव हो जाता है परन्तु यदि उच्च अधिकारी उदासीन हो जायें तो समन्वय असम्भव हो जाता है। खेत में घास तो स्वयं ही उत्पन्न हो जाती है। यदि जागरूक कृषक निराने का प्रबन्ध न करे तो खेत बरबाद हो जाता है। और यदि खेत का स्वामी ही पौधों और घास में समन्वय करने का यत्न करता रहे तो उस खेत का अल्लाह ही बेली है।

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