स्वामी दयानन्द सरस्वती साधारण मनुष्य थे

स्वामी दयानन्द न ईश्वर थे, और न ईश्वर के अवतार, न ईश्वर के दूत (पैग़म्बर)। वे तो साधारण मनुष्य थे। साधारण शब्द को सुनकर चौंकिये मत। सोचिये ! साधारण शब्द का प्रयोग करके मैं न तो स्वामी दयानन्द की निन्दा करना चाहता हूँ न उनकी पूजनीयता में कमी।

Aryasamaj
स्वामी दयानन्द सरस्वती साधारण मनुष्य थे
Pt. Ganga Prasad Upadhyay

पंडित गंगाप्रसाद (६ सितम्बर १८८१ - २९ अगस्त १९६८) एक आर्य समाजी लेखक और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य थे। वे हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, फारसी और संस्कृत भाषाओं के प्रकांड पंडित थे। ... Know More


  • Apr 22 2022

• बुद्धि पर ताला : स्वामी दयानन्द न ईश्वर थे, और न ईश्वर के अवतार, न ईश्वर के दूत (पैग़म्बर)। वे तो साधारण मनुष्य थे। साधारण शब्द को सुनकर चौंकिये मत। सोचिये ! साधारण शब्द का प्रयोग करके मैं न तो स्वामी दयानन्द की निन्दा करना चाहता हूँ न उनकी पूजनीयता में कमी। आजकल जितने धर्म प्रचलित हैं उन सब के अनुयायियों ने अपने आचार्यों में कुछ न कुछ अलौकिक ईश्वरीय गुणों का अध्यारोप कर रखा है। राम के भक्त राम को ईश्वर का अवतार मानते हैं, ईसा के भक्त ईसा को ईश्वर का बेटा मानते हैं, मुसलमान मुहम्मद साहब को ईश्वर का विशेष दूत मानते हैं। बौद्ध लोग ईश्वर को तो नहीं मानते तथापि बुद्ध भगवान् के साथ अनेक ईश्वर के जैसी कल्पनाएं प्रसिद्ध करते हैं। सिख लोग भी गुरुनानक के व्यक्तित्व में अलौकिक ईश्वरीय अंश का अनुभव करते हैं। तिब्बत का दलाई लामा अलौकिक चमत्कार के द्वारा परम्परा से एक ही व्यक्ति अवतरित होता रहता है

• पौराणिक संस्कार : स्वामी दयानन्द ने इन सब मान्यताओं का खण्डन किया है। इसलिए स्वामी दयानन्द के व्यक्तित्व के साथ इस प्रकार की अलौकिक धारणाओं का सम्बन्ध जोड़ना आर्यसमाजियों के लिए सर्वथा निन्द्य होना चाहिए। लोग गीता के यदा यदा हि धर्मस्य के आधार पर प्रायः यह मानने लगते हैं कि स्वामी दयानन्द को ईश्वर ने विशेष आपत्तियों के समय विशेष रीति से संसार में भेजा‌ यह प्रवृत्ति पुराने पौराणिक संस्कारों के कारण है। ‌ आर्यसमाजियों का भी जी ललचाने लगता है कि जब अन्य आचार्यों के साथ अनेक अलौकिक गाथाएं जुड़ी हुई हैं तो हमारा आचार्य क्यों इनसे वंचित रह जाए, परन्तु वे स्वामी दयानन्द के मूल मन्तव्य को नहीं समझते। स्वामी दयानन्द ने उन सब मान्यताओं का खण्डन किया है जिनके कारण अन्य धर्मों में भ्रान्तियां फैली हुई हैं। ईश्वर कभी किसी को कहीं भी विशेष दूत बनाकर नहीं भेजता है, उसके लिए भीषण से भीषण परिस्थितियां भी साधारण हैं। उसकी सृष्टि भी अपार है उसकी व्यवस्था एक सी चलती है। उसी व्यवस्था में उच्च आत्माएं अपनी आन्तरिक प्रेरणाओं से सुधार भी करती रहती हैं। इसलिए यह कहना कि स्वामी दयानन्द ईश्वर की ओर से विशेष दूत बनकर आए, उनके निजी श्रेय को कम करना है।

• ऋषि की जन्म जन्मान्तरों की तपस्या : स्वामी दयानन्द साधारण मनुष्य थे वे ईश्वर के हाथ में खिलौने नहीं थे, उन्होंने मानव धर्म के संशोधन की प्रवृत्ति अपनी जन्म जन्मान्तर की तपस्याओं द्वारा उपार्जित की थी। उनके ये गुण उन्हें अनायास प्राप्त नहीं हो गए थे और उन्होंने इन्हीं गुणों की सहायता से आर्यसमाज स्थापित किया और संसार में सुधार करने की प्रवृत्ति आर्यसमाजियों को प्रदान की। जब हम स्वामी दयानन्द को मनुष्य के रूप में देखेंगे तभी हम उनकी तपस्याओं का पूरा मूल्य अंकित कर सकेंगे, और तभी हम आर्यसमाज के कार्य को आगे बढ़ा सकेंगे। आर्यसमाजियों में पुराने पौराणिक संस्कारों के उभरने से ऐसी प्रवृत्ति उत्पन्न हो गई हैं जो स्वामी दयानन्द में अलौकिकता का भान करने के लिए दूसरे मत-मतान्तरों की तरह संकुचित हुए जा रहे हैं। कोई कहता है कि स्वामी दयानन्द निर्भ्रान्त थे, स्वामी दयानन्द ने तो कभी नहीं कहा कि मैं निर्भ्रान्त हूँ। उन्होंने यह भी नहीं कहा कि अमुक ऋषि निर्भ्रान्त था, इसीलिए उन्होंने सभी ऋषियों को परतः प्रमाण माना है। निर्भ्रान्तता का अर्थ भी क्या। पूर्णज्ञ प्रभु ही निर्भ्रान्त हो सकता है, परन्तु कुछ व्यक्ति अपने स्वार्थ की सिद्धि के लिए ऐसी ऊटपटांग मनगढन्त बातों का प्रचार करते हैं जिससे उनकी धाक सर्वसाधारण पर बनी रहे। स्वामी दयानन्द किस बात में निर्भ्रान्त थे और किस बात में संभ्रान्त। यह तो वही जानते हैं, उनके विषय में व्यर्थ ऐसे प्रश्न उठाना मुख्य समस्याओं की ओर से मुंह मोड़ना है। स्वामी दयानन्द हमारे आचार्य थे, हमारे पथ-प्रदर्शक थे। उन्होंने हमें सत्य की खोज करने के उपाय बताए। उनमें से एक भी उपाय ऐसा नहीं है कि मुझे निर्भ्रान्त मानकर आंखें बन्द करके जो कुछ हमारी किताबों में लिखा है या छपा है उसे मानते चले जाओ। और जो कोई अपनी बुद्धि लगावे उसको स्वामी दयानन्द का शत्रु कहकर बदनाम करो। यह तो वैसी बात हुई जैसी ईसाई मुसलमान किया करते थे कि धर्म के मामले में अक्ल को चलाना जुल्म है। आर्यसमाज में आजकल यह प्रवृत्ति घोर समस्या का रूप धारण कर रही है और इसके कारण मुख्य कार्य तो बन्द हो गया है या रुक गया है, और ईर्ष्या द्वेष घर कर रहे हैं। आर्य नेताओं के लिए यह एक समस्या है और भयानक समस्या है।

[स्रोत : गंगा ज्ञान सागर, भाग चौथा, संपादक : प्राध्यापक राजेंद्र ‘जिज्ञासु’, पृ. 420-421, प्रस्तुतकर्ता : भावेश मेरजा]
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