श्री आदरणीय स्वामी यति नरसिंहानन्द जी के नाम एक पत्र

आज हमारा सामान्य जन सिद्धान्त व शास्त्र विधान से कोसों दूर चला गया है। इस पक्ष में मेरा केवल एक विनम्र निवेदन है कि कृपया इस प्रकार की त्रुटियों को सुधार कर शास्त्र विधि के अनुसार प्रचार-प्रसार किया जाये, जिससे हमारे समाज में सामान्य जन अपने धर्म के शुद्ध स्वरुप को प्राप्त कर पायें।

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श्री आदरणीय स्वामी यति नरसिंहानन्द जी के नाम एक पत्र
Raj Kumar Arya

राज कुमार आर्य एक वैदिक विचारधारा से जुड़े वेदों के विद्यार्थी हैं। शास्त्र-स्वध्याय इनके जीवन का महत्वपूर्ण भाग है। अधिकतर इन्टरनेट के माध्यम से वैदिक धर्म का प्रचार व प्रसार करते रहते हैं। ... Know More


  • Apr 22 2022

ओ३म्

श्री आदरणीय स्वामी यति नरसिंहानन्द जी महाराज,

नमस्ते!

ईश्वर कृपा से आप सदैव स्वस्थ रहें, एवं आप द्वारा किया गया धर्म के प्रति कार्य सभी के लिए प्रेरणादायक रहे, ऐसी मेरी कामना है। यह पत्र मैं एक निवेदन के रूप में आप की सेवा में प्रेषित कर रहा हूँ। कृपया अपने विचारों से अवश्य अवगत कराइये गा एवं अपने आशीर्वाद से वंचित मत रखियेगा।

सनातन धर्म के लिए वर्तमान समय न केवल विपरीत है, अपितु चहुँओर से इसी धर्म को, विधर्मियों द्वारा जड़ से उखाड़ने के कोटिशः प्रयास भी किये जा रहे हैं, इस बात से आप भलीभांति अवगत हैं। यही कारण है कि आपने अपने जीवन को राष्ट्र व धर्म के प्रति न्यौछावर कर दिया है, इस तथ्य को मैं भलीभांति मानता हूँ। धर्म के प्रति जो युद्ध जनता पर आक्रमणों के रूप में हो रहा है, उससे अधिक धर्म से हटाने के लिए, बौद्धिक/वैचारिक स्तर के आक्रमण अधिक घातक रूप ले रहे हैं। इस का उदहारण युवावर्ग के मन में शास्त्रों के प्रति अश्रद्धा उत्पन्न करना भी एक है। और इस तथ्य की उपेक्षा भी नहीं की जा सकती। इस लिए विशेष करके समाज के प्रतिष्ठित विद्वत गणों का कर्तव्य और अधिक अपेक्षित होने लगता है। परन्तु दुःखद तथ्य यह भी है कि इस वर्तमान परस्थितियों में हमारे समाज के धर्म से जुड़े महानुभावों का बौद्धिक स्तर, शास्त्रों के परिपेक्ष्य में संतोषजनक नहीं है। हमारे समाज में धर्म के विषयों पर जो जानकारी मीडिया के माध्यम से साझा की जाती है, वह प्रमाणिक कम और अप्रमाणिक ज्यादा होती है। धर्म के शत्रु ऐसी त्रुटियों का लाभ उठाकर, युवावर्ग को अधिक भ्रमित करते रहते हैं। क्योंकि वर्तमान समाज अपने शास्त्रों के प्रति कम सजग रह गया है। और यही कारण हमारे समाज को अपने धर्म के प्रति श्रद्धावान बनने में असमर्थ बनाता है, इसलिए श्री कृष्ण महाराज जी ने भगवद्गीता के 16 अध्याय के श्लोक 23 एवं 24 में कहा है कि –

यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।

न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्॥ १६-२३॥

तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।

ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥ १६-२४॥

अर्थात् जो मनुष्य शास्त्रविधि को छोड़कर अपनी इच्छासे मनमाना आचारण करता है, वह न सिद्धि को, न सुख को और न परम गति को प्राप्त होता है। अतः तेरे लिए कर्तव्य-अकर्तव्य के व्यवस्था में शास्त्र ही प्रमाण है। ऐसा जानकर तू इस लोक में शास्त्रविधि से नियत कर्तव्य-कर्म करने को योग्य है।

मैं यहाँ पर एक घटना का उल्लेख करना चाहता हूँ, जिस का सम्बन्ध आप से है। आज मैंने यूट्यूब पर एक विडियो देखा, जो सूर्य बुलेटिन नाम के चैनल पर गीता ज्ञान प्रवाह नामी श्रंखला का भाग एक है, जो 11 अप्रैल 2020 को अपलोड किया गया है। जिस में आप के द्वारा भगवद्गीता के विषय पर बात रखी गयी है। इस विडियो में ३:३५ मिनट से आप ने भगवद्गीता को साक्षात् परमात्म वाणी बताते हुए वेद के विषय में अपने विचार रखे हैं, जिस में आप ने कहा है कि –

“वेदों का सार ही गीता है। लेकिन अलग-अलग महात्माओं ने, अलग-अलग समय चक्र में वेदों के श्लोक अथवा मंत्रो की रचना की। अर्थात् वेदों की ऋचाओं की रचना अलग-अलग काल में की गयी।”

मैं बहुत ही क्षमा-याचना के साथ यह निवेदन करना चाहता हूँ, कि आप का उपरोक्त कथन ना केवल सनातन धर्म के सिद्धान्तों के विपरीत है, अपितु भगवद्गीता के कथन के विरुद्ध भी है। यहाँ मात्र भगवद्गीता के केवल दो श्लोकों को उद्धृत किया जा रहा है कृपया अवलोकन कीजिए गा –

ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः।

ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा॥ १७-२३॥

अर्थात् ओम् तत् सत् इन तीन प्रकार के नामों से परमात्मा का निर्देश किया गया है, उसी परमात्मा से सृष्टि के आदि में वेदों तथा ब्राह्मणों और यज्ञों की रचना हुई है।

कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्।

तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्॥ ३-१५॥

अर्थात् तू कर्मों को वेद से उत्पन्न जान और वेद को अक्षर ब्रह्म से प्रगट हुआ जान। इसलिए वह सर्वव्यापी परमत्मा यज्ञकर्म में नित्य स्थित हैं।

उक्त संदर्भों से यह बात स्पष्ट दिखती है, कि सृष्टि के आदि में वेद परमात्मा द्वारा रचा गया काव्य है। परन्तु आप का कथन कथित श्लोकों का विरोध करता है। आप ने अपने धर्म की हानि का कारण जिन आशंकाओं को बताया है, कहीं ना कहीं आप के शब्दों ने उसी हानि को बढ़ाया है। मैं आप के प्रति व्यक्तिगत सादर प्रेम व स्नेह रखता हूँ। सो कृपया मेरी बातों को अन्यथा मत लीजिये गा। आप भलीभांति जानते हैं, कि आज हमारे समाज का पतन शास्त्रों से दुरी एवं शास्त्रों की अवज्ञा ही रहा है। और यदि समाज में सम्मानित एवं विद्वान माने जाने वाले महानुभावों द्वारा कोई शास्त्र विरोधी बात कही जाय तो वह बात धर्म-शास्त्र से अनभिज्ञ सामान्य जन के लिए अनुकरणीय ही होती है। इस बात की साक्षी श्री कृष्ण महाराज जी द्वारा कहे भगवद्गीता के ३ अध्याय के श्लोक २१ से भी मिलती है –

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।

स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥ ३-२१॥

अर्थात् श्रेष्ठ मनुष्य जो-जो आचरण करता है, दुसरे मनुष्य वैसा-वैसा ही आचारण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण कर देता है, दुसरे मनुष्य उसीके अनुसार आचरण करते हैं।

इसी प्रकार की बातें हमारे समाज में यत्र-तत्र समाहित हैं। इसलिए आज हमारा सामान्य जन सिद्धान्त व शास्त्र विधान से कोसों दूर चला गया है। इस पक्ष में मेरा केवल एक विनम्र निवेदन है कि कृपया इस प्रकार की त्रुटियों को सुधार कर शास्त्र विधि के अनुसार प्रचार-प्रसार किया जाये, जिससे हमारे समाज में सामान्य जन अपने धर्म के शुद्ध स्वरुप को प्राप्त कर पायें।

मेरी किसी बात से यदि आप को कोई दुःख हुआ हो, उसके लिए मैं आपसे पुनः क्षमा याचना करता हूँ।

नितान्त अनुगृहीत

राजकुमार आर्य

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