वेद और योग का दीवाना पंडित गुरुदत्त विद्यार्थी

उसे योग और वेद की धुन थी। जब गुरुदत्त जी स्कूल की आठवीं जमात में पढ़ते थे, तभी से उन्हें शौक था कि जिसके बारे में योगी होने की चर्चा सुनी, उसके पास जा पहुंचे। प्राणायाम का अभ्यास आपने बचपन से ही आरंभ कर दिया था।

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वेद और योग का दीवाना पंडित गुरुदत्त विद्यार्थी
Pandit Indra Vidya Vachaspati

इन्द्र विद्यावाचस्पति का जन्म ९ नवम्बर सन् १८८९ को पंजाब के जालन्धर जिले के नवां शहर में हुआ था। उनकी शिक्षा-दीक्षा गुरुकुल कांगड़ी में हुई। अध्ययन के समय ही उन्हें सद्धर्म प्रचारक के सम्पादन का मौका मिला। यहीं से उनकी प्रवृति पत्रकारिता की ओर गयी। ... Know More


  • Apr 22 2022

किसी एक धुन के सिवा मनुष्य कोई बड़ा काम नहीं कर सकता। धुन भी इतनी कि दुनिया उसे पागल कहे। पंडित पंडित गुरुदत्त के अन्दर पागलपन तक पहुंची हुईं धुन विद्यमान थी। उसे योग और वेद की धुन थी। जब गुरुदत्त जी स्कूल की आठवीं जमात में पढ़ते थे, तभी से उन्हें शौक था कि जिसके बारे में योगी होने की चर्चा सुनी, उसके पास जा पहुंचे। प्राणायाम का अभ्यास आपने बचपन से ही आरंभ कर दिया था। इसी उम्र में एक बार बालक को एक नासारंध्र को बंद करके सांस उतारते चढ़ाते देखकर माता बहुत नाराज़ हुईं थी। उसे स्वभावसिद्ध मातृस्नेह ने बतला दिया कि अगर लड़का इसी रास्ते पर चलता गया तो फ़कीर बन कर रहेगा।

अजमेर में योगी [महर्षि दयानंद] की मृत्यु को देख कर योग सीखने की इच्छा और भी अधिक भड़क उठी। लाहौर पहुंच कर पंडित जी ने योग दर्शन का स्वाध्याय आरंभ कर दिया। अपने जीवन की घटनाओं को दिखने और निरंतर उन्नति करने के लिये डायरी लिखा करते थे। उस डायरी के बहुत से भाग कई सज्जनों के पास विद्यमान थे। उनके पृष्ठों से पत्ता चलता है कि ज्यों-ज्यों समय बीतता गया, पंडित जी की योग साधना की इच्छा भी प्रबल होती गई। आप प्रतिदिन थोड़े बहुत प्राणायाम करने लगे।

अमरीका के प्रसिद्ध लेखक एण्ड्रो जैक्सन डेविस के ग्रंथों ने पंडित जी पर गहरा प्रभाव उत्पन्न किया। डेविस महोदय को अमरीका के बहुत से लोग Seer (परोक्षदर्शी) कहा करते थे। वह प्रायः एकाग्र और एकान्तवासी बनकर बोला करता था, उस समय एक आदमी उसके शब्दों को लिखता जाता था। वही शब्द पुस्तक रूप में लिखे जाते थे। पंडित जी डेविस महोदय के ग्रंथों को बहुत बड़ी भक्ति से पढ़ते थे। आप कहा करते थे कि एण्ड्रो जैक्सन डेविस एक योगी है, जिसके वाक्यों में सचाई कूट-कूट कर भरी हुईं है। डेविस महोदय के लेखों को पढ़कर आपकी योग में श्रद्धा और भी अधिक बढ़ गई थी। कुछ समय तक गवर्नमेंट [कालिज] में सायंस के सीनियर प्रोफेसर रह कर आपने वह नौकरी छोड़ दी। आपके मित्रों ने बहुत आग्रह किया कि ‘आप नौकरी न छोड़िये। केवल दो घंटे पढ़ाना पड़ता है, उससे कोई हानि नहीं?’ आपने उत्तर दिया कि प्रातः:काल के समय मैं योगाभ्यास करना चाहता हूं, उस समय को मैं कालिज के अर्पण नहीं कर सकता। यह पहला ही अवसर था कि पंजाब का एक हिन्दुस्तानी ग्रेजुवेट गवर्नमेंट कालिज में सायंस का बड़ा प्रोफेसर हुआ था। कालिज के अधिकारियों और हितैषियों ने बहुत समझाया, परन्तु योग के दीवाने ने एक न मानी।

[स्रोत : आर्यसमाज का इतिहास, भाग-1, पृष्ठ 244-45, प्रस्तुतकर्ता : भावेश मेरजा]

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