वेद प्रचार कैसे हो?

इस छोटे से प्रश्न का उत्तर सरल नहीं है। प्रथम तो वेदप्रचार से क्या तात्पर्य है? दूसरे केन लोगों में प्रचार करना है? कोई ऐसी अमृतधारा नहीं जो सब रोगों और सब रोगियों पर लागू की जा सके।

Aryasamaj Hinduism Vedas Vedic Dharma Vedic Science
वेद प्रचार कैसे हो?
Pt. Ganga Prasad Upadhyay

पंडित गंगाप्रसाद (६ सितम्बर १८८१ - २९ अगस्त १९६८) एक आर्य समाजी लेखक और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य थे। वे हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, फारसी और संस्कृत भाषाओं के प्रकांड पंडित थे। ... Know More


  • Apr 22 2022

इस छोटे से प्रश्न का उत्तर सरल नहीं है। प्रथम तो वेदप्रचार से क्या तात्पर्य है? दूसरे केन लोगों में प्रचार करना है? कोई ऐसी अमृतधारा नहीं जो सब रोगों और सब रोगियों पर लागू की जा सके।

वेदप्रचार के दो अर्थ हो सकते हैं। एक तो वैदिक मान्यताओं (मन्तव्यों और अमन्तव्यों) का प्रचार करना। दूसरे वैदिक ग्रन्थों के अध्ययन को प्रसारित करना। ये दोनों एक बात नहीं। बहुत से कालों में वैदिक ग्रन्थों का अच्छा अध्ययन रहा। जैसे उव्वट, महीधर, सायण आदि वैदिक ग्रन्थों के अच्छे अध्येता थे। याज्ञिकों में वैदिक पुस्तकों का अध्ययन था परन्तु वैदिक सिद्धान्तों से यह कोसों दूर थे। इसी प्रकार आर्यसमाज ने वैदिक सिद्धान्तों का निरन्तर प्रचार करके बहुत सो अवैदिक मान्यताओं का निराकरण किया है, परन्तु उसी के अनुपात से वैदिक साहित्य के अध्ययन में वृद्धि नहीं हुई। बहुत से लोग आर्यसमाज के सिद्धान्तों पर श्रद्धा रखते हैं परन्तु उनमें इतनी योग्यता ही नहीं कि वैदिक ग्रन्थों का अवलोकन कर सकें। आर्यसमाज के पहली पीढ़ी के नेताओं की यही अवस्था थी परन्तु उन्होंने वैदिक सिद्धान्तों का इस योग्यता से प्रचार किया कि जनता में वेदिक ग्रन्थों के प्रति अपूर्व श्रद्धा उत्पन्न हो गई। १८६९ ई० में काशी-शास्त्रार्थ के समय वेद काशी में भी नहीं मिलते थे। महर्षि दयानन्द के आन्दोलन से भारत ही नहीं विदेशों में भी वैदिक अध्ययन की रुचि बढ़ गई। मैक्समूलर ने ‘स्वामी दयानन्द’ पर एक प्रमुख लेख लिखा। ऋषिवर के देहान्त के उपरान्त न केवल ‘वेदों’ के नये संस्करण छपे अपितु शेष-भाष्य की पूर्ति के लिए भी यत्न किया। पं० तुलसीराम स्वामी जी ने सामवेद भाष्य किया। श्री शिवशंकर काव्यतीर्थ तथा श्री आर्य मुनि जी ने ऋग्वेद के छूटे हुए मण्डलों का भाष्य किया। श्री पं० क्षेमकरण दास त्रिवेदी जी ने अथर्ववेद भाष्य किया। पं० जयदेव विद्यालंकार ने चारों वेदों का सरल अनुवाद निकाला। अभी वर्तमान काल में श्री महात्मा देवीचन्द ने यजुर्वेद, सामवेद के अंग्रेज़ी में अनुवाद किये। श्री सातवलेकर जी, श्री विदेह जी तथा अन्य कई विद्वानों ने अपने अपने ढंग पर वेदों को जनता में अधिक प्रिय बनाने के अनेक प्रयास किये हैं। कई पत्र-पत्रिकाएं जैसे वेदप्रकाश, वेदवाणी कुछ न कुछ प्रयत्न करते ही रहते हैं। फिर भी यह कहना असत्य न होगा कि स्वामी दयानन्द के आरम्भिक कार्य के पश्चात् आर्यसमाज की ओर से संगठित रूप से वैदिक ग्रन्थों के प्रचार में कोई प्रशंसनीय कार्य नहीं हुआ।

इसका दोष किसको दिया जाये? ‘आर्यसमाज जागरूक नहीं’ ऐसा कहना कठिन होगा। हम निरन्तर किसी न किसी रूप में कार्य करते रहे हैं। और हमारी सेवाओं का देश ने, जाति ने, जनता ने मान किया है। हम सामाजिक और नैतिक अवस्था में अपूर्व परिवर्तन कर सके हैं परन्तु वैदिक ग्रन्थों की कुछ आन्तरिक क्लिष्टताएं इस प्रकार की हैं कि उन पर विजय पाना कठिन हो रहा है। प्रश्न यह है कि वर्तमान परिस्थिति में क्या किया जाये? गत वर्षों में वैदिक मान्यताओं के प्रचार ने ही वेदों के लिए श्रद्धा उत्पन्न की है और वही नुस्खा भविष्य में भी कारगर होगा। हमारे भजनीक यद्यपि वेद-कथा नहीं कहते फिर भी जनता में यह तो विश्वास हो ही जाता है कि सब बुराइयां वैदिक अध्ययन से दूर हो सकती हैं। इसलिए वैदिक मन्तव्यों के प्रचार के सब छोटे से छोटे उपकरणों को प्रयोग में लाना चाहिए। जिस जनता में बस्तीराम पहुंच सकते थे उसमें स्वामी श्रद्धानन्द जी के लिए प्रवेश करना कठिन था। मैंने यह छोटी सी बात अनुभव के आधार पर लिखी है। कई वर्ष हुए एक आर्य सज्जन आये और कहने लगे कि मैंने वेद पढ़ना बन्द कर दिया है। “क्यों?” “इसलिए कि अमुक पण्डित जी ने लिखा है कि बिना स्वर के वेद पढ़ना पाप है और मैं स्वर नहीं जानता।” मैंने उसको समझाया कि बच्चे तो तुतलाकर ही बोलते हैं। वे पापी नहीं हैं। यह स्वर का नियम तो विवेकी पण्डितों के लिए ही है। ‘पात्र और कुपात्र’ का सिद्धान्त तो ठीक है परन्तु इसका अविद्या वश दुरुपयोग बहुत हुआ है।

उच्च श्रेणी के वेदों को पढ़ने और पढ़ाने वाले तो स्वयं यथोचित मार्ग खोज सकते हैं। उनके लिए मेरे परामर्श की अपेक्षा नहीं है, परन्तु उनको ध्यान रखना चाहिए कि वे उन प्रवृत्तियों का मनोवैज्ञानिक रूप से अध्ययन करें, जिनके कारण लोग वेदों की ओर आकर्षित नहीं होते। ‘वितर्कबाधने प्रतिपक्षभावनम्।’ यहां भी उपयोगी होगा। प्रश्न यह नहीं है कि हमारा कथन ठीक है या बेठीक। प्रश्न यह है कि विपक्षी के मस्तिष्क में कौन सी विचारधारा बह रही है जिसके कारण वह हमारी बात नहीं मानता। वेदों के पक्ष में बहुत सी पुस्तकें लिखी गईं जो पाण्डित्यपूर्ण हैं परन्तु प्रतिपक्ष की मनोवृत्ति को ध्यान में रखकर नहीं लिखी गईं। जो बात केवल वेदों के विशेषज्ञ पाठक ही निर्धारित कर सकते हैं, उसका इस लेख में संकेत करना निरर्थक है। सर्वसाधारण के लिए एक छोटी सी पुस्तक होनी चाहिए जो सरल वेदमन्त्रों का संग्रह हो और जिनके आधार पर वैदिक सिद्धान्तों की छोटी सी व्याख्या हो। सर्वसाधारण के लिए चारों वेद पढ़ना इस युग में तो बहुत कठिन है।

फिर भी जनता में यह श्रद्धा उत्पन्न करनी चाहिए कि प्रत्येक आर्य को वेद का पाठ मात्र तो प्रतिदिन करना चाहिए। इस विषय में मुसलमान लोगों का प्रयास अनुकरणीय है। साधारण मुसलमान न अरबी भाषा जानता है, न इस्लाम के सिद्धान्तों को समझता है, परन्तु फिर भी कुरान पढ़ता अवश्य है। हर घर में कुरान मिलेगी। और हर पढ़ा लिखा मुसलमान कुरान का नित्य पाठ करता मिलेगा। यह है तो अन्धविश्वास परन्तु ‘साधारण विश्वास’ के लिए सोपान या सीढ़ी तो है ही। यह ठीक है कि बिना अर्थ समझे वेद पढ़ना ‘अधेन्वा’ (बिना दूध की गौ) या ‘अफला, अपुष्पां’ (बिना फल-फूल वाली) वाटिका के सदृश है परन्तु साथ ही यह भी ठीक है कि स्वर-प्रक्रिया का अध्ययन या महाभाष्य के अवलोकन का उत्साह दिलाना तो ठीक है परन्तु ऐसा डरा देना ठीक नहीं कि लोग दूर भागने लगें। ‘इन्द्र-शत्रु’ का दृष्टान्त महाभाष्यकार ने वैयाकरणों के लिए दिया है, साधारण जनता के लिए नहीं। ‘प्रोत्साहन’ लक्ष्य है ‘हतोत्साहन’ नहीं।

#ved #Vedas #vedic dharma #वेद

Leave a Comment

Your email address will not be published.

*
*
*

Related post